Saturday, February 6, 2010
संसद के भीतर राजनीति के अलग रंग है, संसद के बाहर अलग रंग।
राजनीति जितनी तेजी से रंग बदल रही है, उसमें से आदमी का रंग उसी गति से गायब होता जा रहा है। कहीं शिवसेना के रंग से पूरा देश हांफने लगता है तो कहीं लालू-पासवान के सुर से नितीश और कांग्रेस की सांसें फूल जाती है। जयाप्रदा और जया बच्चन की जुबान चलते ही समाजवादी पार्टी ठिठुरने लगती है तो अमर सिंह की बात पर रामगोपाल चौंक पड़ते हैं। संसद के भीतर राजनीति के अलग रंग है, संसद के बाहर अलग रंग। इन्हीं रंगों के भेद खोल रहा है .... sansadji.com सांसदजी डॉट कॉम
Thursday, February 4, 2010
शिक्षा का अधिकारः जुगाड़ से नहीं चलेगा काम
देश में बुनियादी शिक्षा की मौजूदा तस्वीर, भले ही अतीत की अपेक्षा उत्साहजनक कही जाए लेकिन शिक्षा का अधिकार कानून बनाए जाने के बाद आनुपातिक संतुलन बनाने में अभी काफी लंबा समय लगने से इनकार नहीं किया जा सकता है। एक ताजा सर्वे रिपोर्ट पर गौर करें तो देश में स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। राष्ट्रीय स्तर पर 7 से 10 वर्ष के 2.7 प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं और 11 से 14 वर्ष के स्कूल न जाने वाले बच्चों का प्रतिशत 6.3 प्रतिशत है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में भी तेजी से सुधार हो रहा है। छत्तीसगढ़ में तीसरी कक्षा में पहुंचे ऐसे छात्रों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, जो कम से कम पहली कक्षा की किताब तो पढ़ ही लेते हैं। वर्ष 2007 में ऐसे बच्चों की संख्या राज्य में 31 प्रतिशत थी, जैसे महज एक वर्ष में बढ़कर 70 प्रतिशत हो गया। मध्य प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश ऐसे राज्य है, जहां के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की बुनियादी समझ सबसे बेहतर है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बच्चों की गणित की बेसिक समझ अच्छी हुई है। दोनों ही राज्यों में कक्षा 1 के 91 प्रतिशत बच्चे 1 से 9 तक के नंबरो को आराम से पहचान लेते हैं। कक्षा पांच में पढ़ने वाले 61 प्रतिशत बच्चे घड़ी के समय को सही तरीके से देख लेते हैं। 45.6 प्रतिशत गांवो में ही प्राइवेट स्कूल है। 67.1 प्रतिशत गांवों में सरकारी मिडिल स्कूल है, तो 33.8 प्रतिशत गांवों में सरकारी सेकेंडरी स्कूल है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान के अलावा 2007 के बाद से कई राज्यों में स्कूल न जाने वाले बच्चों की प्रतिशत संख्या में गिरावट आई है। शिक्षा में पीछे रहने वाले बिहार ने तेजी से रफ्तार पकड़नी शुरू की है। बिहार में 6 से 14 साल तक के स्कूल न जाने वाले बच्चों का प्रतिशत 2005 में जहां 13 था, जो अब महज 5.7 प्रतिशत रह गया है। छह से चौदह वर्ष के बच्चों में प्राइवेट स्कूल में जाने की संख्या में इजाफा हुआ है। 2005 में जहां 16.4 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते थे, तो 2008 में ये आंकड़ा बढ़कर 22.5 प्रतिशत हो गया। कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में प्राइवेट स्कूलों में सबसे ज्यादा लोगों ने नामांकन कराया। केरल और गोवा के आधे से ज्यादा बच्चे प्राइवेट स्कूलों में जाते हैं। 2008 में 7 से 10 और 10 से 14 वर्ष के प्राइवेट स्कूल जाने वाले बच्चों में लड़कियों के मुकाबले 20 प्रतिशत लड़के ज्यादा हैं। कक्षा एक में पढ़ने वाले 24.75 प्रतिशत बच्चों की उम्र 6 वर्ष से कम है। पांच वर्ष की उम्र तक के 56.6 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते हैं। राजस्थान, जम्मू और कश्मीर, पंजब, हिमाचल और हरियाणा के 5 वर्ष तक की उम्र के 70 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते हैं। हिमाचल, हरियाणा और तमिलनाडु में पांच वर्ष की उम्र के बच्चों की स्कूल जाने की संख्या में पिछले तीन वर्षो में 16 से 20 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
अब सिक्के के दूसरे पहलू पर गौर फरमाए। अभी पिछले महीने ही, यानी जनवरी 2010 में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन और बीएस चौहान की खंडपीठ को अवगत कराया था कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार मुहैया कराने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है और इसे 2010 के मध्य तक लागू किया जाएगा। इसे लागू करने के लिए नियम बनाए जा रहे हैं जो कि अप्रैल अथवा मई तक तैयार हो जाएंगे। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2002 में 6-14 वर्ष के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराने के लिए संविधान में संशोधन किए गए थे, जिसे अब सात साल बीत चुके हैं। संसद ने निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा विधेयक को चार माह पूर्व पारित कर दिया था, लेकिन अभी तक न तो इस कानून को अधिसूचित किया गया है और न ही यह लागू हो पाया है। इस संबंध में प्रधान न्यायाधीश का कहना था कि अगर यह कानून बलपूर्वक लागू होता है तो बच्चे काम करने के बजाय स्कूल में होंगे। न्यायालय ने इस मुद्दे पर उठाए गए कदमों के बारे में सरकार से एक हलफनामा दाखिल करने को भी कहा। इस मामले की आगामी सुनवाई अब अगले महीने मार्च में होनी है। पिछले साल नवंबर में देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की जयंती पर एक समारोह में प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने के लिए दस लाख शिक्षकों की ज़रूरत है। इसके लिए देश को अभी से गुणवत्तापरक शिक्षा के बारे में सोचना होगा। देश में आगे आने वाले समय में तकनीकी शिक्षा का भी बहुत बड़ा योगदान होने वाला है, इसलिए यह भी प्रयास किया जाना चाहिए कि इस तरह की शिक्षा प्रदान करने के लिए देश में आधारभूत ढांचा विकसित होता चले। यह सच है कि इस तरह के परिवर्तन एकदम से नहीं आ जाते हैं वरन इनके लिए पहले से सोच विचार कर काम किए जाने की आवश्यकता होती है। देश के आगे के समुचित विकास के लिए शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण होती जा रही है। ऐसे में इस बात की आवश्यकता बढ़ जाती है कि देश में शिक्षा के लिए बहुत कुछ और भी किया जाए। आज के समय में देश साक्षर तो हो रहा है पर शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए अभी बहुत समर्पण की ज़रूरत है। देश में शिक्षा के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा योजनाओं पर झूठे आंकडे पेश करने से आती है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत कितनी राशि खर्च की जा चुकी है, इसका कोई अनुमान नहीं है पर जिस तरह से साक्षरता दर बढ़नी चाहिए थी, वैसे नहीं बढ़ी। कहीं न कहीं सरकारी स्तर पर क्रियान्वयन में कमी है तो कहीं पर हमारे शिक्षक जो इस काम के लिए रखे गए हैं, जुगाड़ लगाकर केवल शहरों के आस-पास ही पढाना चाहते हैं, जिससे पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है।
दूसरी तरफ शिक्षा के अधिकार कानून को अमलीजामा पहनाने के लिए भारी-भरकम राशि का इंतजाम केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती साबित होने जा रहा है । केंद्र सरकार स्वीकार कर चुकी है कि केंद्र के पास कानून को लागू करने के लिए तकरीबन एक लाख 64 हजार करोड़ रूपए का इंतजाम बड़ी चुनौती है लेकिन केंद्र की चिंता को दरकिनार करते हुए राज्य सरकारों ने केंद्र से इस एक्ट को लागू करने के लिए ज्यादा पैसे की मांग की है । वित्तीय साझेदारी के सवाल पर केंद्र को पहली चिठ्ठी भाजपा शासित मध्यप्रदेश से मिली। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मानवसंसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को पत्र लिखकर कहा है कि शिक्षा के अधिकार कानून के लिए जरूरी कवायद शुरू करने के लिए जो पैसा खर्च होगा, उसका 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र वहन करे। वित्तीय आवश्यकता पूरी होने पर ही कानून पर प्रभावी अमल संभव हो पाएगा । उन्होंने कानून का समर्थन करते हुए कहा है कि इसके प्रावधानों से निश्चित रूप से शिक्षा के मामले में बुनियादी फर्क दिखने लगेगा, लेकिन पैसे की उपलब्धता को उन्होंने बड़ी समस्या बताया है । गौरतलब है कि मानवसंसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र भेजकर शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने की दिशा में ठोस पहल शुरू करने का अनुरोध किया था। मानवसंसाधन मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय ने वित्तीय जरूरतों के संबंध में वित्तमंत्रालय को लिखा है। वित्तमंत्रालय से अनुरोध किया गया है कि वह इस संबंध में जरूरी दिशा-निर्देश वित्त आयोग को दें। केंद्र की मंशा यह है कि सर्वशिक्षा अभियान सहित बुनियादी तालीम के लिए चल रही अलग-अलग योजनाओं को शिक्षा के अधिकार का हिस्सा बना दिया जाए। मानवसंसाधन मंत्रालय के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि कानून लागू करने के लिए नियम बनाए जा रहे हैं। जल्द ही वित्तीय साझेदारी का फार्मूला ढूंढ़ लिया जाएगा, लेकिन केंद्र की मंशा यह है कि जिस तरह से एसएसए सहित अन्य केंद्रीय योजनाओं में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी तय है, उसी तर्ज पर शिक्षा के अधिकार के लिए पैसा खर्च हो। मंशा ये भी है कि गरीब छात्रों की पढ़ाई के लिए मुक्त लोन की योजना पेश करने के बाद अब केंद्र सरकार उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए एक वित्त निगम गठित करना चाहती है। यह निगम शिक्षण संस्थानों व सामाजिक संगठनों को सस्ते कर्ज मुहैया कराएगा, ताकि वे उच्च शिक्षा के ढांचे को मजबूत करने में मदद कर सकें। मानव संसाधन मंत्रालय की योजना के अनुसार प्रस्तावित नेशनल हायर एजुकेशन फाइनेंस कॉपोर्रेशन (एनएचएफसी) उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाएगा। उसकी पूंजीगत जरूरतों को पूरा करेगा। शिक्षा के क्षेत्र में यह परोपकारी संगठनों को बढ़ावा देगा। पिछड़े इलाकों में व्यावसायिक व उच्च शिक्षा संस्थान स्थापित करने के लिए उन्हें कम दरों में कर्ज उपलब्ध कराएगा। एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, यह उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नाबार्ड जैसे संस्थान की तरह काम करेगा। यह बांड जारी कर या बेचकर बाजार से धन जुटाएगा। विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए कर्ज मुहैया कराएगा।
जब हम बुनियादी शिक्षा अथवा नागरिकों के शिक्षा के अधिकार के वास्तविक हालातों पर गौर करते हैं तो पता चलता है कि हमारे देश की संसद ने आजादी के बासठ साल बाद गरीब बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का मूलभूत अधिकार देने वाला शिक्षा अधिकार बिल पारित किया है। छह से चौदह वर्ष की आयु के देश के सभी नौनिहालों, विशेषकर कमजोर वर्ग के बच्चों को कक्षा आठ तक अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा पाने का अधिकार देने वाले विधेयक को संसद द्वारा पारित कर दिए जाने को बेशक मील का पत्थर कहा जाएगा। यह बिल लंबे समय से संसद से हरी झंडी पाने की बाट जोह रहा था। अब तक देश में कमजोर वर्ग के करोड़ों बच्चों को गरीबी की वजह से शिक्षा से वंचित रह जाना पड़ता था, लेकिन मुफ्त शिक्षा अधिकार बिल के कानून बन जाने के बाद उनके अभिभावकों को उन्हें अपने निवास के निकटवर्ती स्कूल में भर्ती कराने में आसानी होगी। अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा कानून के अंतर्गत शिक्षा से जुड़े कुछ अन्य प्रावधानों को भी स्पष्ट किया गया है। इसमें प्राइवेट ट्यूशन पर प्रतिबंध, डोनेशन और शारीरिक दंड पर रोक जैसे मामले प्रमुख हैं। साथ ही, इसमें बच्चों को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से बचाने का भी प्रावधान किया गया है। कक्षा आठ तक किसी भी विद्यार्थी को कक्षा से निकालने या फेल करने को भी गैरकानूनी बना दिया गया है। गौरतलब है कि इस कानून को लागू करने की जो कवायद वर्ष 2005 में शुरू हुई थी, उसमें उपेक्षित बच्चों की श्रेणी में विकलांगों को भी शामिल किया गया था। अब बिल पारित होने के बाद इस श्रेणी को व्यापक तौर पर स्पष्ट किया गया है। इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति, क्षेत्र, लिंग के आधार पर उपेक्षित बच्चों को परिभाषित किया गया है जबकि विकलांग बच्चों को उपेक्षित नहीं माना गया था। यह बताना भी जरूरी है कि विकलांग बच्चों को उपेक्षित बच्चों की श्रेणी में रखने की सिफारिश स्वयं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने की है। शिक्षा अधिकार बिल के पास होने के बाद शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग प्रसन्न तो हैं, लेकिन उनका कहना है कि इसे अमल में लाना बेहद जटिल कार्य होगा। केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जरूरी कई बदलाव लाने होंगे। वे राज्य जो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं, उन्हें योजना को अमली जामा पहनाने के लिए वित्त आयोग से मदद लेनी जरूरी हो जाएगी। इस सबके बावजूद शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि शिक्षा अधिकार बिल असमानता को बढ़ावा ही देगा। सरकारी स्कूलों, राज्य से सहायता प्राप्त स्कूल, विशेष दर्जा स्कूल और गैर सहायता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता अलग-अलग दर्जे की है और बिल में कहीं समान स्तर की शिक्षा देने की बात नहीं की गई है।
राज्यों में बुनियादी शिक्षा की जरूरतों यानी शिक्षा के अधिकार का मसला उठने पर यह भी जानना जरूरी हो जाता है कि सितंबर 2008 में संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दी अभियान ने हर बच्चे को शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से शिक्षा अधिकार यात्राओं को को शिक्षा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ कार्यक्रम (बेस्ट प्रैक्टिस) के रूप में मान्यता दी थी। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 63वें अधिवेशन के दौरान इस बाबत घोषणा करने का निर्णय लिया गया था। इस योजना का प्रारूप नेशनल कंफेड्रेशन ऑफ दलित ऑरगेनाइजेशन्स (नैकडोर) ने तैयार किया था। अधिवेशन में भाग लेने के लिए वहां पहुंचे नैकडोर अध्यक्ष अशोक भारती ने बताया था कि संयुक्त राष्ट्र की नॉन गवर्नमेंटल लाइजन सर्विस (एनजीएलएस) ने आठ विभिन्न क्षेत्रों में सहस्रताब्दी विकास लक्ष्य तय किए हैं, जिन्हें 2015 तक पूरा किया जाना है। संयुक्त राष्ट्र ने शिक्षा अधिकार यात्रा को शिक्षा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ पहल के रूप में स्वीकार किया है। शिक्षा अधिकार यात्रा के दौरान बच्चों और अभिवावकों को शिक्षा के लिए प्रेरित किया जाता है। इस यात्रा की बदौलत हरियाणा में कुछ महीनों के भीतर स्कूल छोड़ने का प्रतिशत करीब 75 प्रतिशत घट गया। शिक्षा अधिकार यात्रा को ब्रिटेन के अंतर्राष्ट्रीय विकास विभाग से भी सहयोग मिला है। भारतीय समाज में, बात मध्य प्रदेश की हो अथवा छत्तीसगढ़ की या अन्य किसी राज्य की, समाज में बच्चों के शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करते हुए समतामूलक समाज निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाना आज हमारी पहली जरूरतों में से एक है। आज कामन स्कूल सिस्टम लागू किया जाना उतना ही जरूरी हो गया है, जितना कि भूखों की भूख मिटाना। शिक्षा अधिकार कानून 2009 के बाल विरोधी और शिक्षा विरोधी प्रावधानों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना भी हमारी प्राथमिक जिम्मेदारियों में शुमार है। इसके लिए आदिवासी एवं दलित समुदायों की शिक्षा की हालत पर विशेष तौर से ध्यान देना होगा।
अब सिक्के के दूसरे पहलू पर गौर फरमाए। अभी पिछले महीने ही, यानी जनवरी 2010 में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन और बीएस चौहान की खंडपीठ को अवगत कराया था कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार मुहैया कराने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है और इसे 2010 के मध्य तक लागू किया जाएगा। इसे लागू करने के लिए नियम बनाए जा रहे हैं जो कि अप्रैल अथवा मई तक तैयार हो जाएंगे। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2002 में 6-14 वर्ष के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराने के लिए संविधान में संशोधन किए गए थे, जिसे अब सात साल बीत चुके हैं। संसद ने निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा विधेयक को चार माह पूर्व पारित कर दिया था, लेकिन अभी तक न तो इस कानून को अधिसूचित किया गया है और न ही यह लागू हो पाया है। इस संबंध में प्रधान न्यायाधीश का कहना था कि अगर यह कानून बलपूर्वक लागू होता है तो बच्चे काम करने के बजाय स्कूल में होंगे। न्यायालय ने इस मुद्दे पर उठाए गए कदमों के बारे में सरकार से एक हलफनामा दाखिल करने को भी कहा। इस मामले की आगामी सुनवाई अब अगले महीने मार्च में होनी है। पिछले साल नवंबर में देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की जयंती पर एक समारोह में प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने के लिए दस लाख शिक्षकों की ज़रूरत है। इसके लिए देश को अभी से गुणवत्तापरक शिक्षा के बारे में सोचना होगा। देश में आगे आने वाले समय में तकनीकी शिक्षा का भी बहुत बड़ा योगदान होने वाला है, इसलिए यह भी प्रयास किया जाना चाहिए कि इस तरह की शिक्षा प्रदान करने के लिए देश में आधारभूत ढांचा विकसित होता चले। यह सच है कि इस तरह के परिवर्तन एकदम से नहीं आ जाते हैं वरन इनके लिए पहले से सोच विचार कर काम किए जाने की आवश्यकता होती है। देश के आगे के समुचित विकास के लिए शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण होती जा रही है। ऐसे में इस बात की आवश्यकता बढ़ जाती है कि देश में शिक्षा के लिए बहुत कुछ और भी किया जाए। आज के समय में देश साक्षर तो हो रहा है पर शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए अभी बहुत समर्पण की ज़रूरत है। देश में शिक्षा के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा योजनाओं पर झूठे आंकडे पेश करने से आती है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत कितनी राशि खर्च की जा चुकी है, इसका कोई अनुमान नहीं है पर जिस तरह से साक्षरता दर बढ़नी चाहिए थी, वैसे नहीं बढ़ी। कहीं न कहीं सरकारी स्तर पर क्रियान्वयन में कमी है तो कहीं पर हमारे शिक्षक जो इस काम के लिए रखे गए हैं, जुगाड़ लगाकर केवल शहरों के आस-पास ही पढाना चाहते हैं, जिससे पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है।
दूसरी तरफ शिक्षा के अधिकार कानून को अमलीजामा पहनाने के लिए भारी-भरकम राशि का इंतजाम केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती साबित होने जा रहा है । केंद्र सरकार स्वीकार कर चुकी है कि केंद्र के पास कानून को लागू करने के लिए तकरीबन एक लाख 64 हजार करोड़ रूपए का इंतजाम बड़ी चुनौती है लेकिन केंद्र की चिंता को दरकिनार करते हुए राज्य सरकारों ने केंद्र से इस एक्ट को लागू करने के लिए ज्यादा पैसे की मांग की है । वित्तीय साझेदारी के सवाल पर केंद्र को पहली चिठ्ठी भाजपा शासित मध्यप्रदेश से मिली। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मानवसंसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को पत्र लिखकर कहा है कि शिक्षा के अधिकार कानून के लिए जरूरी कवायद शुरू करने के लिए जो पैसा खर्च होगा, उसका 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र वहन करे। वित्तीय आवश्यकता पूरी होने पर ही कानून पर प्रभावी अमल संभव हो पाएगा । उन्होंने कानून का समर्थन करते हुए कहा है कि इसके प्रावधानों से निश्चित रूप से शिक्षा के मामले में बुनियादी फर्क दिखने लगेगा, लेकिन पैसे की उपलब्धता को उन्होंने बड़ी समस्या बताया है । गौरतलब है कि मानवसंसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र भेजकर शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने की दिशा में ठोस पहल शुरू करने का अनुरोध किया था। मानवसंसाधन मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय ने वित्तीय जरूरतों के संबंध में वित्तमंत्रालय को लिखा है। वित्तमंत्रालय से अनुरोध किया गया है कि वह इस संबंध में जरूरी दिशा-निर्देश वित्त आयोग को दें। केंद्र की मंशा यह है कि सर्वशिक्षा अभियान सहित बुनियादी तालीम के लिए चल रही अलग-अलग योजनाओं को शिक्षा के अधिकार का हिस्सा बना दिया जाए। मानवसंसाधन मंत्रालय के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि कानून लागू करने के लिए नियम बनाए जा रहे हैं। जल्द ही वित्तीय साझेदारी का फार्मूला ढूंढ़ लिया जाएगा, लेकिन केंद्र की मंशा यह है कि जिस तरह से एसएसए सहित अन्य केंद्रीय योजनाओं में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी तय है, उसी तर्ज पर शिक्षा के अधिकार के लिए पैसा खर्च हो। मंशा ये भी है कि गरीब छात्रों की पढ़ाई के लिए मुक्त लोन की योजना पेश करने के बाद अब केंद्र सरकार उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए एक वित्त निगम गठित करना चाहती है। यह निगम शिक्षण संस्थानों व सामाजिक संगठनों को सस्ते कर्ज मुहैया कराएगा, ताकि वे उच्च शिक्षा के ढांचे को मजबूत करने में मदद कर सकें। मानव संसाधन मंत्रालय की योजना के अनुसार प्रस्तावित नेशनल हायर एजुकेशन फाइनेंस कॉपोर्रेशन (एनएचएफसी) उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाएगा। उसकी पूंजीगत जरूरतों को पूरा करेगा। शिक्षा के क्षेत्र में यह परोपकारी संगठनों को बढ़ावा देगा। पिछड़े इलाकों में व्यावसायिक व उच्च शिक्षा संस्थान स्थापित करने के लिए उन्हें कम दरों में कर्ज उपलब्ध कराएगा। एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, यह उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नाबार्ड जैसे संस्थान की तरह काम करेगा। यह बांड जारी कर या बेचकर बाजार से धन जुटाएगा। विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए कर्ज मुहैया कराएगा।
जब हम बुनियादी शिक्षा अथवा नागरिकों के शिक्षा के अधिकार के वास्तविक हालातों पर गौर करते हैं तो पता चलता है कि हमारे देश की संसद ने आजादी के बासठ साल बाद गरीब बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का मूलभूत अधिकार देने वाला शिक्षा अधिकार बिल पारित किया है। छह से चौदह वर्ष की आयु के देश के सभी नौनिहालों, विशेषकर कमजोर वर्ग के बच्चों को कक्षा आठ तक अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा पाने का अधिकार देने वाले विधेयक को संसद द्वारा पारित कर दिए जाने को बेशक मील का पत्थर कहा जाएगा। यह बिल लंबे समय से संसद से हरी झंडी पाने की बाट जोह रहा था। अब तक देश में कमजोर वर्ग के करोड़ों बच्चों को गरीबी की वजह से शिक्षा से वंचित रह जाना पड़ता था, लेकिन मुफ्त शिक्षा अधिकार बिल के कानून बन जाने के बाद उनके अभिभावकों को उन्हें अपने निवास के निकटवर्ती स्कूल में भर्ती कराने में आसानी होगी। अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा कानून के अंतर्गत शिक्षा से जुड़े कुछ अन्य प्रावधानों को भी स्पष्ट किया गया है। इसमें प्राइवेट ट्यूशन पर प्रतिबंध, डोनेशन और शारीरिक दंड पर रोक जैसे मामले प्रमुख हैं। साथ ही, इसमें बच्चों को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से बचाने का भी प्रावधान किया गया है। कक्षा आठ तक किसी भी विद्यार्थी को कक्षा से निकालने या फेल करने को भी गैरकानूनी बना दिया गया है। गौरतलब है कि इस कानून को लागू करने की जो कवायद वर्ष 2005 में शुरू हुई थी, उसमें उपेक्षित बच्चों की श्रेणी में विकलांगों को भी शामिल किया गया था। अब बिल पारित होने के बाद इस श्रेणी को व्यापक तौर पर स्पष्ट किया गया है। इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति, क्षेत्र, लिंग के आधार पर उपेक्षित बच्चों को परिभाषित किया गया है जबकि विकलांग बच्चों को उपेक्षित नहीं माना गया था। यह बताना भी जरूरी है कि विकलांग बच्चों को उपेक्षित बच्चों की श्रेणी में रखने की सिफारिश स्वयं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने की है। शिक्षा अधिकार बिल के पास होने के बाद शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग प्रसन्न तो हैं, लेकिन उनका कहना है कि इसे अमल में लाना बेहद जटिल कार्य होगा। केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जरूरी कई बदलाव लाने होंगे। वे राज्य जो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं, उन्हें योजना को अमली जामा पहनाने के लिए वित्त आयोग से मदद लेनी जरूरी हो जाएगी। इस सबके बावजूद शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि शिक्षा अधिकार बिल असमानता को बढ़ावा ही देगा। सरकारी स्कूलों, राज्य से सहायता प्राप्त स्कूल, विशेष दर्जा स्कूल और गैर सहायता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता अलग-अलग दर्जे की है और बिल में कहीं समान स्तर की शिक्षा देने की बात नहीं की गई है।
राज्यों में बुनियादी शिक्षा की जरूरतों यानी शिक्षा के अधिकार का मसला उठने पर यह भी जानना जरूरी हो जाता है कि सितंबर 2008 में संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दी अभियान ने हर बच्चे को शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से शिक्षा अधिकार यात्राओं को को शिक्षा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ कार्यक्रम (बेस्ट प्रैक्टिस) के रूप में मान्यता दी थी। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 63वें अधिवेशन के दौरान इस बाबत घोषणा करने का निर्णय लिया गया था। इस योजना का प्रारूप नेशनल कंफेड्रेशन ऑफ दलित ऑरगेनाइजेशन्स (नैकडोर) ने तैयार किया था। अधिवेशन में भाग लेने के लिए वहां पहुंचे नैकडोर अध्यक्ष अशोक भारती ने बताया था कि संयुक्त राष्ट्र की नॉन गवर्नमेंटल लाइजन सर्विस (एनजीएलएस) ने आठ विभिन्न क्षेत्रों में सहस्रताब्दी विकास लक्ष्य तय किए हैं, जिन्हें 2015 तक पूरा किया जाना है। संयुक्त राष्ट्र ने शिक्षा अधिकार यात्रा को शिक्षा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ पहल के रूप में स्वीकार किया है। शिक्षा अधिकार यात्रा के दौरान बच्चों और अभिवावकों को शिक्षा के लिए प्रेरित किया जाता है। इस यात्रा की बदौलत हरियाणा में कुछ महीनों के भीतर स्कूल छोड़ने का प्रतिशत करीब 75 प्रतिशत घट गया। शिक्षा अधिकार यात्रा को ब्रिटेन के अंतर्राष्ट्रीय विकास विभाग से भी सहयोग मिला है। भारतीय समाज में, बात मध्य प्रदेश की हो अथवा छत्तीसगढ़ की या अन्य किसी राज्य की, समाज में बच्चों के शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करते हुए समतामूलक समाज निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाना आज हमारी पहली जरूरतों में से एक है। आज कामन स्कूल सिस्टम लागू किया जाना उतना ही जरूरी हो गया है, जितना कि भूखों की भूख मिटाना। शिक्षा अधिकार कानून 2009 के बाल विरोधी और शिक्षा विरोधी प्रावधानों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना भी हमारी प्राथमिक जिम्मेदारियों में शुमार है। इसके लिए आदिवासी एवं दलित समुदायों की शिक्षा की हालत पर विशेष तौर से ध्यान देना होगा।
Monday, February 1, 2010
जयाप्रदा का जवाब.... मैं अमर सिंह को चुनूँगी
समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह के बाद पार्टी सांसद जयाप्रदा ने पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधा है. रामपुर की सांसद जयाप्रदा ने दिल्ली में चार पार्टी विधायक और बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में कहा कि अगर पार्टी के किसी सदस्य पर परिवार के लोग हमला कर रहे हैं तो उसको रोकना पार्टी नेतृत्व का काम है.उनका निशाना सीधे मुलायम सिंह यादव पर था, हाँ उन्होंने सीधे तौर पर उनका नाम नहीं लिया जयाप्रदा ने कहा कि वह नेताजी से स्नेह करती हैं और वो उनके पिता सामान हैं. अगर मुझे मुलायम सिंह और अमर सिंह में से किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं अमर सिंह को चुनूँगी क्योंकि अमर सिंह ने मुश्किल की घड़ी में मेरा साथ दिया है
जब उनसे पूछा गया कि अगर ऐसा मौक़ा आया कि उन्हें मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह के बीच एक को चुनना पड़ा तो वह किसको चुनेंगीं? तो उनका जवाब था अमर सिंह को, जिन्होंने मुश्किल की घड़ी में उनका साथ दिया था.उन्होंनें इस बार रामपुर में हुए चुनाव का उदाहरण दिया जहाँ उनके निजी जीवन पर कीचड़ उछाला गया.जया प्रदा ने अमर सिंह के नेतृत्व में एक लोकमंच बनाने की घोषणा की.हालाँकि इसकी बात अमर सिंह गाज़ीपुर की एक रैली में शनिवार को ही कर चुके थे.उन्होंने कहा कि यह एक राजनीतिक मंच नहीं और यह मंच आम लोगों से जुड़े मामले अलग अलग स्तर पर उठाएगा.
जब उनसे पूछा गया कि अगर ऐसा मौक़ा आया कि उन्हें मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह के बीच एक को चुनना पड़ा तो वह किसको चुनेंगीं? तो उनका जवाब था अमर सिंह को, जिन्होंने मुश्किल की घड़ी में उनका साथ दिया था.उन्होंनें इस बार रामपुर में हुए चुनाव का उदाहरण दिया जहाँ उनके निजी जीवन पर कीचड़ उछाला गया.जया प्रदा ने अमर सिंह के नेतृत्व में एक लोकमंच बनाने की घोषणा की.हालाँकि इसकी बात अमर सिंह गाज़ीपुर की एक रैली में शनिवार को ही कर चुके थे.उन्होंने कहा कि यह एक राजनीतिक मंच नहीं और यह मंच आम लोगों से जुड़े मामले अलग अलग स्तर पर उठाएगा.
Saturday, January 30, 2010
नीति-अनीति-राजनीतिः...माया, मोदी और मीरा कुमार
ये हैं कुछ महत्वपूर्ण सूचनाएं। ताजा-बासी सियासी जानकारियां। दिल्ली और देश की। नीति-अनीति और राजनीति की।
......मायावती और ब्राह्मणवादी मीडिया
......महात्मा गांधी, नरेंद्र मोदी और नितिन गडकरी
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कुलाधिपति प्रो.नामवर सिंह और कुलपति विभूतिनारायण राय के जातिवादी कारनामे

ठाकुर साहब
राय साहब
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वर्धा जले या महाराष्ट्र, राहुल का नामांकन नहीं होगा!
देश भर में धर्मनिरपेक्ष प्रशासक की छवि निर्मित करने वाले पुलिस अधिकारी विभूति नारायण राय के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में कुलपति बनने के बाद दलितों का उत्पीड़न तेजी के साथ बढ़ा है। क्या कोई धर्मनिरपेक्षवादी जातिवादी नहीं हो सकता है? दलित उत्पीड़न की ऐसी शर्मनाक घटनाएं एक नई बहस खड़ी करती हैं। और सवाल उठाती हैं उस प्रगतिशीलता तथा कम्युनिज्म पर भी, जिसकी पहचान भुनाते रहे हैं वर्धा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति तथा कथित आलोचक डॉ.नामवर सिंह और कुलपति विभूति नारायण राय।
कुछ इस तरह शुरू होती है वर्धा विश्वविद्यालय में दलित उत्पीड़न की कहानी। विश्वविद्यालय के अनुवाद विद्यापीठ में राहुल कांबले ने एम फिल की परीक्षा में टॉप ( स्वर्ण पदक) किया लेकिन पीएचडी में उसका नामांकन नहीं किया गया। अनुवाद विद्यापीठ में दो विद्यार्थियों का ही नामांकन करने का फैसला विश्वविद्यालय ने किया। पीएच.डी. के लिए चयनित विद्यार्थियों में राहुल कांबले को तीसरे नंबर पर दिखाया गया, लेकिन जब चयनित दो विद्यार्थियों में से एक विद्यार्थी ने अनुवाद विद्यापीठ में पीएचडी में नामांकन नहीं लिया तो राहुल ने अपना दावा पेश किया। लगातार तीन महीने तक उसे प्रताड़ित किया गया। उसने नामांकन की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए सूचना के अधिकार के तहत विश्वविद्यालय प्रशासन से जानकारी मांगी थी। अनुवाद विद्यापीठ के डीन प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव ने सूचना का अधिकार कानून का इस्तेमाल करने की आड़ लेकर राहुल का नामांकन लेने से मना कर दिया। राहुल कुलपति विभूति नारायण राय के समक्ष अपनी फरियाद लेकर गया, लेकिन कुलपति ने बजाय उसके साथ न्याय करने के प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव से माफी मांगने का निर्देश दिया। राहुल ने प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव से चार बार माफी मांगी। उनके पैर तक पकड़े, लेकिन कुलपति ने नामांकन की स्वीकृति नहीं दी। आखिरकार राहुल ने आंदोलन करने की चेतावनी दी। आम्बेडकर स्टूडेंट्स फोरम ने राहुल के मामले को उठाया। 8 दिसंबर को विश्वविद्यालय ने दीक्षांत समारोह का आयोजन किया था। दलित छात्रों ने उसका बहिष्कार किया। दलित छात्रों का बड़ा हिस्सा दीक्षांत समारोह में दिए जाने वाले पदकों को लेने नहीं गया। उसी दिन राहुल कांबले आमरण अनशन पर भी बैठ गया। उसके बाद उसके समर्थन में कई दलित छात्र क्रमवार अनशन पर बैठने लगे। जबकि दीक्षांत समारोह में शामिल होने के लिए आए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष डा. सुखदेव थोरात ने अनशन कर रहे विद्यार्थियों के पास जाकर उनके प्रति अपनी सहानुभूति प्रगट की। लेकिन डा. थोरात के कहने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन राहुल का नामांकन लेने को तैयार नहीं हुआ। विद्यार्थियों ने कुलाधिपति नामवर सिंह से भी मुलाकात की। उन्होंने कहा कि दलितों का जितना नामांकन गांधी के विश्वविद्यालय में होता है, उतना अम्बेडकर विश्वविद्यालयों में भी नहीं होता होगा। डा. नामवर सिंह से विद्यार्थियों ने अनशन स्थल पर आने का अनुरोध किया लेकिन दो दिनों तक अनशन स्थल से सौ कदम की दूरी पर रहने के बावजूद वे अनशनकारी विद्यार्थियों से मिलने नहीं गए। कुलपति लगातार कई दिनों तक अनशन स्थल के बगल से ही सुबह टहलने के लिए निकलते रहे, लेकिन उन्होंने विद्यार्थियों से मिलने व बातचीत करने की जरूरत नहीं महसूस की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी छह माह और छह वर्ष तक भी आंदोलन करेंगे तो उनका नामांकन नहीं हो सकता है। प्रति कुलपति मानवशास्त्री डा. नदीम हसनैन को यह दुख हुआ कि विद्यार्थियों के अनशन की वजह से उन्हें सुबह टहलने का अपना रास्ता बदलना पड़ा। ट्रेड यूनियन आंदोलन की पृष्ठभूमि वाले विशेष कर्तव्य अधिकारी राकेश (श्रीवास्तव) ने कहा कि वर्धा जले या महाराष्ट्र या हिन्दुस्तान, राहुल का नामांकन नहीं किया जाएगा। दलित विद्यार्थी लगातार संघर्ष करते रहे।
इतना ही नहीं, कुलपति की और भी कई जातिवादी करतूतें हैं। पिछले सत्र में विभूति नारायण राय के कार्यभार संभालने के बाद विश्वविद्यालय में जेआरएफ पाने वाले पहले छात्र संतोष बघेल को तुलनात्मक साहित्य में पीएचडी में नामांकन देने से मना कर दिया गया। संतोष विश्वविद्यालय में पदक प्राप्त मेधावी छात्र रहा है। नामांकन नहीं किए जाने की स्थिति में संतोष बघेल को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा। दलित विधार्थियों ने जिला प्रशासन के सामने जाकर अनशन किया। लेकिन अनशन के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन का एक भी प्रतिनिधि उनसे मिलने नहीं गया। तब विश्वविद्यालय परिसर में संगठन बनाना और आंदोलन करना भी संभव नहीं था। पुलिस कुलपति का एक भय पूरे वातावरण में व्याप्त रहता था। बाद में उन विद्यार्थियों ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग समेत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के समक्ष गुहार लगायी और बताया कि पिछले तीन वर्षों से आरक्षण नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। साहित्य में पहले पीएचडी में यदि दलित छात्रों के नामांकन हुए तो उन्हें किसी दलित शिक्षक के तहत ही शोध कराने की अघोषित व्यवस्था हनुमान प्रसाद शुक्ला के समय में रही है। 2009 में जनसंचार विभाग में पीएचडी में प्रवेश परीक्षा हुई और उसके बाद इंटरव्यू लिए गए। जिस पैनल ने ये प्रक्रिया पूरी की, उसमें संस्कृति विद्यापीठ के डीन, विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर, एक रीडर, एक विशेषज्ञ और अनुसूचित जाति एवं जनजाति की बतौर प्रतिनिधि एक रीडर थी। उस समय दस विद्यार्थियों को पीएचडी में लेना था। जब परीक्षा परिणाम आया तो उसमें पिछड़े, दलित विद्यार्थियों की तादाद ज्यादा थी। वे आरक्षण की सीट से ज्यादा सामान्य वर्ग के रूप में भी सफल घोषित किए गए। तब दस सीटों के लिए नामांकन करने की घोषणा की गई थी, लेकिन वे परीक्षा परिणाम रद्द कर दिए गए। दोबारा परीक्षा आयोजित की गई। दोबारा परीक्षा की प्रक्रिया किस तरह से पूरी की गई, गौरतलब है। विश्वविद्यालय से बाहर के एक शिक्षक ने ही प्रश्न पत्र तैयार किया। परीक्षा की कॉपी जांची और वहीं इंटरव्यू में बैठा। इस बार अनुसूचित जाति एवं जनजाति का प्रतिनिधि पैनल में नहीं था। परीक्षा परिणाम तीन दिनों की प्रक्रिया में ही निकाल दिया गया। इस परीक्षा परिणाम में ज्यादा सवर्ण विद्यार्थियों को चयनित किया गया। मजे की बात कि इस पैनल में विभाग के एक भी शिक्षक को नहीं रखा गया। सीटों की संख्या भी दस से तेरह कर दी गई।
कुलपति की एक और जातीय करतूत। दिसंबर 6, 2009 को आम्बेडकर स्टूडेंट्स फोरम ने महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर मोमबत्ती यात्रा का कार्यक्रम आयोजित किया। यात्रा विश्वविद्यालय परिसर से होकर वर्धा स्थित आम्बेडकर प्रतिमा तक गई। इसमें दलित विद्यार्थियों के अलावा अन्य विद्यार्थी शामिल हुए, लेकिन पहली बात तो ये हुई कि इस यात्रा में विश्वविद्यालय के एक मात्र दलित प्रोफेसर लेल्ला कारुण्यकारा भी शामिल हुए तो उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। आरोप लगाया गया कि उन्होंने जातीय नारे लगाए। नारे थे -ब्राहम्णवाद मुर्दाबाद, मनुवाद मुर्दाबाद , जातिवाद मुर्दाबाद आदि। प्रोफेसर कारुण्यकारा को दिए गए नोटिस में कहा गया कि उन्होंने परिसर का वातावरण दूषित किया। उन्हें सात दिनों के भीतर जवाब देने के लिए कहा गया। ये भी चेतावनी दी गई कि यदि सात दिनों के भीतर जवाब नहीं दिया गया तो एकतरफा कार्रवाई कर ली जाएगी। ये नोटिस खुद विभूति नारायण राय ने जारी किया। दूसरी बात कि उसी दिन विश्वविद्यालय ने भारत-ईरान कलाओं के लोक आख्यान कार्यक्रम आयोजित किया। वह रविवार का दिन था। तीसरी बात कि शाम को लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा के लिए विश्वविद्यालय के गांधी हिल्स पर एक अलग कार्यक्रम आयोजित किया गया। दिसंबर 6, 2008 को बाबासाहेब आम्बेडकर दलित एवं जनजाति अध्ययन केन्द्र ने महापरिनिर्वाण दिवस मनाने का फैसला किया था। कार्यक्रम के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन से तीन हजार रूपये की मांग की गई थी। लेकिन दो हजार रूपये ही स्वीकृत किए गए और उसी दिन पुस्तकालय में इससे अलग कविता पाठ का एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसका असर ये हुआ कि 6 दिसंबर 2009 को दलित जनजाति अध्ययन केन्द्र ने कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया। दलित एवं जनजाति अध्ययन केन्द्र की बिल्डिंग के शिलान्यास पत्थर को गिरा दिया गया। इसका शिलान्यास विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष सुखदेव थोरात ने 22 फरवरी 2007 को किया था। इसका दोबारा शिलान्यास कराने की योजना बनी और राज्यपाल आरएस गवई को 2 दिसंबर 2009 को आमंत्रित किया गया, लेकिन वह नहीं आए। आज भी वो शिलान्यास पत्थर कूड़े के ढेर के समान पड़ा हुआ है। डा. आम्बेडकर दलित एवं जनजाति अध्ययन केन्द्र के भवन के निर्माण के लिए एक करोड़ रूपये मिले थे, लेकिन उसका इस्तेमाल दूसरी बिल्डिंग बनाने में कर दिया गया। कुलपति विभूति नारायण राय ने कार्यभार संभालने के बाद तीन शिक्षकों को चार कारण बताओ नोटिस जारी किया और वे सभी शिक्षक दलित एवं आदिवासी हैं। कुलपति विभूति नारायण राय ने अपने कार्यकाल में एक वर्ष के अंदर पचास से ज्यादा अस्थायी बहालियां कीं, उनमें एक भी दलित एवं आदिवासी नहीं है।
प्रगतिशील लेखकों में शुमार कुलपति विभूतिनारायण राय की जातीय करतूतों की दास्तान यहीं खत्म नहीं होती। दलित छात्र-छात्राओं के खिलाफ जातिगत पूर्वाग्रहों को कई बार घटनाओं के रूप में सामने रखना संभव नहीं हो पाता है। ऐसी न जाने कितनी बातें हैं, जो केवल दलित महसूस करता है कि उसके साथ जातिगत भेदभाव किया जा रहा है। दलित विद्यार्थियों का आठ महीने तक राजीव गांधी फेलोशिप रोके रखा गया। कुलपति ने विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के दलित नेताओं को लम्पट कहा। कुलपति ये कहते हैं कि दलित इस विश्वविद्यालय में केवल फैलोशिप के लिए आते हैं। सहायक रजिस्ट्रार (वित्त) सुशील पखिडे वित्त के एक मात्र स्थायी अधिकारी हैं, लेकिन उन्हें वित्त से हटा दिया गया और डिस्टेन्स ( दूरस्थ शिक्षा विभाग) में भेज दिया गया। आयुष छात्रावास के छात्र के रूप में अमरेन्द्र शर्मा के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज है। उन्हें आयुष छात्रावास का ही वार्डेन बना दिया गया। जब विद्यार्थियों ने विरोध किया तो दूसरे छात्रावास का वार्डेन बना दिया गया। विश्वविद्यालय में किसी विद्यार्थी को फेल नहीं किया गया है, लेकिन दलित एवं जनजाति अध्ययन केन्द्र के तीन विद्यार्थियों को फेल कर दिया गया।
एक तरफ तो दलितों के उत्पीड़न की ऐसी शिकायतें है तो दूसरी तरफ जातिवाद के कुछ और नमूने भी देखे जा सकते हैं। विश्वविद्यालय के शांति एवं अहिंसा विभाग के अस्सिटेंट प्रोफेसर मनोज राय को दिल्ली सेंटर का प्रभारी बनाया गया। नियमत: ये गलत है। इन महोदय को वेतन वर्धा में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए दिया जाता है, लेकिन ये महोदय कक्षा नहीं लेते हैं, बल्कि उन्हें दिल्ली में मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के डिलिंग के काम में लगाया गया है। तीसरी बात कि कुलपति स्वंय को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं, लेकिन मनोज राय घोषित तौर पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े रहे हैं। मनोज राय ने सूचना के अधिकार के तहत बतौर सूचना अधिकारी सूचना लेने की फीस दस रुपये से बढ़ाकर नियमों के विपरीत पचास रुपये कर दिया था। चूंकि वे स्वजातीय हैं, इसीलिए उनके लिए सब क्षम्य है और वे इनाम पाने के हर तरह से हकदार हैं। विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग का प्रमुख डा. अनिल कुमार राय अंकित को बनाया गया है। वे दक्षिणपंथी विचारों के हैं। उनके नाम से छपी दर्जनों किताबों के बारे में पूरे देश में ये छपा है और चैनलों में दिखाया गया है कि उन्होंने अपनी किताबें दूसरे लेखकों की किताबों से सामग्री चुराकर छापी हैं। उन्हें चोर गुरु के रूप में सभी जानते हैं। कुलपति को भी ये सब पता है। उनके यहां बकायदा शिकायत दर्ज करायी गई है। ये सब तथ्य डा. अंकित की नियुक्ति के समय भी उनके सामने मौजूद थे, लेकिन ये उनके स्वजातीय हैं, इसीलिए उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने के बजाय दीक्षांत समारोह के लिए उन्हें हजारों का बजट देकर मीडिया प्रभारी बना दिया गया।
दलित होने पर अनिल चमड़िया को हटाया वीएन राय ने
(भड़ास4मीडिया से साभार)
वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर पद से हटाए गए जाने-माने पत्रकार अनिल चमड़िया का कहना है कि विश्वविद्यालय की जिस एक्जीक्यूटिव कमेटी (ईसी) ने उन्हें हटाने का फैसला लिया, उसमें 18 सदस्य हैं लेकिन केवल आठ अपने करीबी लोगों के साथ बैठक करके कुलपति विभूति नारायण राय ने मनमाना निर्णय करा लिया. वीएन राय ने ईसी की बैठक इसी उद्देश्य से दिल्ली में रखी ताकि वे अपने लोगों के साथ बैठकर इच्छित फैसला करा सकें. ईसी की इस बैठक में जो आठ सदस्य शामिल हुए, उनमें मृणाल पांडे भी हैं जो मेरी विरोधी रही हैं. वीएन राय के दो-तीन स्वजातीय लोग हैं. अनिल चमड़िया ने एक न्यूज पोर्टल से सविस्तार बातचीत में कहा कि ''जिस दिन से मैं यहां आया हूं, वीएन राय मेरे पीछे पड़े हुए हैं. मेरे आते ही उन्होंने मुझसे कहा कि मैं स्टूडेंट्स से हाथ नहीं मिलाऊं, स्टूडेंट्स के हास्टल नहीं जाऊं. जुलाई महीने में मैं वर्धा पहुंचा था और अगस्त महीने में वीएन राय ने मुझसे इस्तीफा देने के लिए कह दिया. आरोप लगाया कि मैं सुबह से रात तक शराब पीता हूं. चाय पीने की बात चली थी तो मैंने कहा था कि मैं काली चाय पीता हूं. इसको वीएन राय ने शराब पीने से जोड़ दिया और आरोप जड़ा कि मैं दिन भर शराब पीता रहता हूं. हद है यह तो. मैं दिल्ली में इतने साल रहा हूं. कोई कह दे कि मैं दिन भर शराब पीता रहता हूं. उन्होंने आरोप लगाया कि मैं हीटर पर खाना बनाता हूं. आठ-आठ आदमी मेरे यहां खाते हैं, मेस चलाता हूं. बताइए, ऐसी बातों और आरोपों को आप क्या कहेंगे. मैं अगर लोगों से मिलता जुलता हूं. लोग मेरे यहां आते हैं तो इसमें आपको क्या दिक्कत. मेरे खिलाफ जितना प्रोपेगंडा कर सकते थे, वीएन राय ने किया.
उन्होंने बताया कि वीएन राय का अस्सी फीसदी वक्त तो मेरे खिलाफ साजिशें-प्रोपेगंडा करने में बीतता है. उनकी कोशिश हमेशा यही रही कि वे मुझे यहां से निकाल दें. इसीलिए उन्होंने अपने एक आदमी के जरिए मेरी नियुक्ति के खिलाफ नागपुर में हाईकोर्ट में मुकदमा करा रखा है. मैं कोर्ट को बताऊंगा कि जब मामला चल रहा है तो उन्होंने मुझे बीच में ही कैसे हटा दिया. दूसरी महत्वपूर्ण बात, जिस आधार पर विवि की ईसी ने मुझे हटाया है, उस आधार पर तो 12 लोगों को हटाया जाना चाहिए. सिर्फ मुझे ही क्यों हटाया गया.डिग्री का कोई मामला नहीं है क्योंकि नियुक्तियों में यूजीसी के दो तरह के प्रावधान होते हैं. एक डिग्रीधारियों की नियुक्ति होती है तो बिना डिग्रीधारियों की भी होती है. बिना डिग्री धारियों के लिए कई पैमाने होते हैं. जैसे उनका संबंधित फील्ड में कांट्रीव्यूशन क्या है, शोध क्या है आदि आदि. बिना डिग्रीधारी पैमाने पर मैं फिट बैठता हूं. अगर आप कह रहे हैं कि गलत क्राइटेरिया पर नियुक्ति हो गई तो उस गलत क्राइटेरिया पर मैं ही क्यों, नियुक्त हुए 12 लोग आएंगे. तो बाकी लोग क्यों नहीं हटाए गए? 1998, 2000 और फिर 2009 में यूजीसी की तरफ से नियुक्ति के लिए जो प्रावधान जारी किए गए, उसी का हवाला देकर मुझे हटाया गया जबकि इन प्रावधानों पर मैं खरा उतरता हूं. आपने कहा कि 1998 के यूजीसी के प्रावधान के आधार पर विज्ञापन निकाला था जो गलत था, इसे 2000 के प्रावधान के आधार पर होना चाहिए था. तो फिर जिन 12 लोगों की नियुक्ति गलत प्रावधान के आधार पर की, उन सभी को हटाया जाना था. सिर्फ मुझे इसलिए हटाया क्योंकि वीएन राय मुझे हटाना चाहते थे. इसीलिए नियम-कायदे को ताक पर रखकर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए मुझे हटा दिया. मेरी नियुक्ति वीएन राय ने यहां पढ़ रहे लड़कों की इच्छा पर की थी. उन्होंने लड़कों से पूछा था कि किसे आप चाहते हो टीचर बनाया जाए. लड़कों ने मेरा नाम लिया. मैं वर्धा में 2004 से पढ़ाने आ रहा हूं. स्टूडेंट्स मुझे चाहते रहे हैं. स्टूडेंट्स ने मेरा नाम लिया. तो मेरी नियुक्ति में केवल वीएन राय की इच्छा नहीं थी बल्कि उन पर स्टूडेंट्स का दबाव भी था. मैं भी छात्रों को पढ़ाने, नई चीजें सिखाने, एक अच्छी पीढ़ी पत्रकारिता में लाने जैसी इच्छाएं पाले हुए दिल्ली छोड़कर वर्धा चला गया. कौन जाता है अपनी बसी-बसाई गृहस्थी छोड़कर पराए शहर. इसे मेरा शौक कहिए या पागलपन. मैंने आते ही कहा कि यहां पत्रकारिता डिपार्टमेंट में अखबार नहीं है, टीवी नहीं है, रेडियो नहीं है, इंटरनेट नहीं है. कैसे चलता है डिपार्टमेंट. सारी व्यवस्थाएं कराने में जुट गया. यह सब वीएन राय को बुरा लगा. मैं हमेशा डिपार्टमेंट बनाने की बात करता रहा हूं और इसके लिए छात्रों की तरफ से लड़ता रहा. मैंने स्टूडेंट्स को गांव में रिपोर्टिंग करने के लिए भेजा. 15 हजार रुपये खर्च आ रहे थे. वीएन राय ने कहा कि यह तो बहुत ज्यादा है, केवल छह हजार रुपये दूंगा. पर उन्होंने छह हजार रुपये भी नहीं दिए. छात्र अपने खर्चे पर बसों से गांव जाते और लौटते. छह हजार रुपये के लिए फाइल घूमती रही पर कुलपति वीएन राय के उस पर दस्तखत आज तक नहीं हुए.
उन्होंने बताया कि जिस स्वजातीय को पत्रकारिता विभाग का एचओडी बना रखा है, वह कितना विवादित शख्स है, इसे दुनिया जानती है. उस पर चोरी करके किताबें लिखने जैसे कई गंभीर आरोप हैं पर उसे वीएन राय का पूरा प्रोटेक्शन मिला हुआ है. जातिवाद खूब चल रहा है. कहीं न कहीं सवर्ण मानसिकता भी काम कर रही है. मैं दलित हूं और दलित आंदोलनों को हमेशा से समर्थन देता रहा हूं. यह भी वीएन राय को मंजूर नहीं था. वे चाहते थे कि मैं उनके हिसाब से रहूं, उनकी हां में हां मिलाऊं. वर्धा में दलित छात्रों ने वीएन राय के रवैए के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन किया. एक महीने तक लगातार आंदोलन चला. पूरा देश जानता है कि मैं दलितों के लिए लड़ता रहा हूं. मेरा तीस साल का सार्वजनिक जीवन है. मेरी अपनी छवि है. मेरा काम करने का अपना तरीका है. मैं छात्रों को बनाने आया था, दलाल पैदा करने नहीं. पीएचडी में दलित ज्यादा उत्तीर्ण हो गए तो मेरे पर वीएन राय ने आरोप लगा दिया कि मैंने रिजल्ट में धांधली की है. हद है यह तो. ऐसी बातें लगातार मेरे खिलाफ की जाती रही हैं. मेरा तो केवल यही पूछना है कि जब एक्जीक्यूटिव कमेटी 18 लोगों की है तो आपने 8 अपने नामिनेट किए हुए लोगों से ही कैसे फैसला करा लिया. वीएन राय के कामकाज के तरीके कारण ही विष्णु नागर ने ईसी से अपना इस्तीफा दे दिया था.अनिल चमड़िया के बारे में विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय का कहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं था कि अनिल चमड़िया दलित हैं। इसी से जुड़ा जवाब हो सकता है कि यूनिवर्सिटी की नई स्थायी-अस्थायी नियुक्तियों में कितने राय के स्वजातीय हैं, यह तो उन्हें मालूम है।
भाकपा ने बिहार में किया संघर्ष का ऐलान

भाकपा बिहार में पचास सीटों पर लड़ेगी: भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) इस वर्षहोने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में 50 सीट पर अपने प्रत्याशी खड़ा करने कीतैयारी कर रही है. भाकपा के राष्ट्रीय महासचिव एबी वर्धन ने पटना में पार्टी की राज्यपरिषद की बैठक के बाद संवाददाता सम्मेलन में कहा कि भाकपा राज्य में 50 सीटपर चुनाव लड़ सकती है, लेकिन इस पर अंतिम निर्णय सहयोगी वामदलों के साथबैठक में लिया जायेगा. उन्होंने बताया कि पार्टी की सभी जिला इकाइयों को निर्देशदिया गया है कि वे अपने अपने जिलों में पार्टी की मजबूत सीटों की सूची बनाकर प्रदेशनेतृत्व को भेजें, ताकि चुनाव लड़ने के संबंध में उसपर निर्णय लिया जा सके. श्री वर्धनने कहा कि पांच मार्च को देश के सभी मजदूर संगठनों ने महंगाई, खाद्य सुरक्षा, लोकतांत्रिक अधिकारों पर हो रहेहमले और बड़े पैमाने पर की जा रही छंटनी के खिलाफ़ राष्ट्रव्यापी जेल भरो अभियान चलाने का निर्णय लिया हैजिसका पार्टी ने भी समर्थन किया है. इसके बाद 12 मार्च को भाकपा, माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, फ़ारवर्ड ब्लॉकऔर रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी इसी मुद्दे पर दिल्ली में प्रदर्शन करेगी. उन्होंने कहा कि इससे पूर्व बिहार में वामसमन्वय समिति 23 फ़रवरी को इन्ही मुद्दों को लेकर समाहरणालयों में कामकाज ठप करेगी.
Wednesday, January 20, 2010
उत्तर प्रदेश में धरतीपुत्र का चरखा दांव
इसे मायावती सरकार को मुलायम सिंह यादव की खुली चुनौती कहें या उत्तर प्रदेश में सन 2012 के विधानसभा चुनाव में अपने हिस्से की धरती की धरतीपुत्र की तलाश, जिसे पहले बसपा, फिर भाजपा, फिर कांग्रेस और अब अमर सिंह की जमात ने बंजर बनाने की कोशिश की है। जमीनी हकीकत ये है कि उत्तर प्रदेश की जनता मायाराज में भ्रष्टाचार को लेकर जितनी विचलित है, केंद्र सरकार द्वारा थोपी महंगाई को लेकर उससे ज्यादा बेचैन। मुलायम सिंह की लड़ाई इसी तरह जारी रही तो, निकट भविष्य में, यानी आगामी विधानसभा चुनाव तक सपा सत्ताधारी बसपा को राजनीतिक त्रिकोण में उलझा सकती है। त्रिकोण हो सकता है सपा, बसपा और कांग्रेस का। पार्टी को एक बार फिर मुंबइया आसमान से धरती पर उतारने में धरती पुत्र को पहले से ज्यादा रणनीतिक तरीके से चरखा दांव मारने होंगे क्यों कि पार्टी-पदों से दरकिनार होते ही स्वास्थ्य की दुहाई देने वाले अमर सिंह की सेहत में अचानक गुणात्मक उछाल आ गया है।
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