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Saturday, February 21, 2009

चाहे जितने रूप चुरा लूं


चाहे जितना भी विष पी लूं,

चाहे जितने भी दिन जी लूं,

जीवन अपनी गंध न देगा.


चाहे जितने फूल चुरा लूं,

चाहे जितना सौरभ पा लूं,

मधुवन अपनी गंध न देगा.


मन में चाहें जितना वर लूं,

चाहे जितनी पूजा कर लूं,

चंदन अपनी गंध न देगा.


चाहे जितनी बातें लिख दूं,

आंखों की बरसातें लिख दूं,

सावन अपनी गंध न देगा.


चाहे जितनी मांग सजा लूं,

चाहे जितने रूप चुरा लूं,

दर्पन अपनी गंध न देगा.


चाहे जिसके द्वार बुला लूं,

चाहे जब सांकल खटका लूं,

आंगन अपनी गंध न देगा.