
चाहे जितना भी विष पी लूं,
चाहे जितने भी दिन जी लूं,
जीवन अपनी गंध न देगा.
चाहे जितने फूल चुरा लूं,
चाहे जितना सौरभ पा लूं,
मधुवन अपनी गंध न देगा.
मन में चाहें जितना वर लूं,
चाहे जितनी पूजा कर लूं,
चंदन अपनी गंध न देगा.
चाहे जितनी बातें लिख दूं,
आंखों की बरसातें लिख दूं,
सावन अपनी गंध न देगा.
चाहे जितनी मांग सजा लूं,
चाहे जितने रूप चुरा लूं,
दर्पन अपनी गंध न देगा.
चाहे जिसके द्वार बुला लूं,
चाहे जब सांकल खटका लूं,
आंगन अपनी गंध न देगा.