झटपट रंग बदल लेते हैं
कैसे मतलब वाले लोग।
मुंह के जितने भोले-भाले
मन के उतने काले लोग।
जब तक चुटकी में रहते हैं
जूठन को प्रसाद कहते हैं
चढ़ी कड़ाही, फिर तो पांचों
उंगली घी में डाले लोग।
यारों, ऐसे-वैसे लोग,
जाने कैसे-कैसे लोग,
हाथों की रेखा हो जाते हैं
पांवों के छाले लोग।
कसौटियों पर उल्टे-सीधे
उनके भी क्या खूब कसीदे
खुद ही खींच-खांच लेते हैं
अपने-अपने पाले लोग।
गूंगों की बस्ती में ठहरे,
थोड़े अंधे, थोड़े बहरे,
खेल रहे कुर्सी-कुर्सी
हाथों में लिये मशालें लोग।
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Friday, June 6, 2008
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