Friday, May 15, 2009

पान, पनही और फुन्न से माथा सुन्न!

पनवा माने पान. पान बनारसी हो तो क्या कहने. राजनीति की भाषा में पनवा को पनही (जूता) और टेलीफोनवा (फुन्न-फुन्न) से जोड़कर देखना चलन में है. चुनाव तिथि घोषित होने से पहले पनवा का दौर था. पांच साल बाद पान-पानी खा-पीकर देशभर के दुरंगे महापुरुष संसद से अपने-अपने इलाके के लिए रवाना हुए. सोमनाथ दा ने खूब किस्से-कहानी भी दुरंगों को सुनाए. (आजकल कहते फिर रहे हैं कि मैं माकपा से गया ही कब था, माने मैं माकपा में ही हूं. पंधे ने कलई छील दी, बोले-छीः ऐसे मोटे मानुस (कांग्रेसी टुकड़खोर) को पार्टी कभी नहीं कबूल करेगी, वो तो उधर ही भालो आछे, प्रतिभा जी की जगह खाली होने पर कांग्रेस उन्हें राष्ट्रपति बना देगी).
चुनाव तिथि घोषित हुई. इसी बीच बेचारे एन.गोपाल स्वामी चुपचाप वैसे ही कुर्सी से विदा हो गए, जैसे परमाणु करार के हो-हल्ले में पूर्व पीएम राजा विसनाथ बाबू चुपचाप दुनिया से चल बसे थे. चुनाव के दौरान पान की जगह पनही ने ले ली. दे दनादन पनही. पांव की पनही चिदंबरम पर पड़ी, खड़ाऊ आडवाणी पर. टकलू मत्था बाल-बाल बच गया. इस बीच दो-एक और की सेवा-खातिरदारी हुई. दुरंगे समझ गए कि लोग बौरा गए हैं, कहीं पिटाई-धुनाई न हो जाए. कहे देते हैं कि अगले चुनाव तक (या मध्यावधि चुनाव तक) इंतजार कीजिए. मतदाता की धड़क खुल चुकी है. हाथ साफ करने का समय आ रहा है. लोकतंत्र का जो मजा पनही में है, वो पान में कहां?
पान, पनही के बाद इन दिनो फोन-फुन्नी का खेल चल रहा है. फोन पर फुन्नी-फुन्नी हो रही है. फुन्न से इधर, फुन्न से उधर. कभी लालू-पासवान के कान में, कभी माया और पवार के कान में फुन्न!! कभी अमर, राजनाथ के कान में, कभी बेकाबू चंद्रबाबू, रामचंद्रबाबू के कान में, कभी सी.राव, मुटल्ली अम्मा के कान में फुन्न!! इस फुन्न-फुन्न से वोटर का माथा सुन्न हो रहा है. सोच रहा है, अभी-अभी ससुरो को दुआरे से एक-एक टुकड़ी खिलाकर खदेड़ा है. ई देखो. सगरे अभी से भांऊ-भांऊ करने लगे. उछल-उछल कर सरकार बनाने का सर्कस दिखा रहे हैं. एक मतदाता बोला- दिखा लो सर्कस. आओ मध्यावधि चुनाव में मार-मार कर टकलू हिप्पीकट बना देंगे. ....कद्रदान, अभी से गिनना शुरू कर दीजिए, टकलू कौन-कौन? पान, पनही, फुन्न-फुन्न के बाद माथा सुन्न करने का समय आ रहा है.

Thursday, May 14, 2009

चिल्लाने दो एनडीए को तुम सरकार बनाना/प्रतिभा पाटिल

टकलू जी का हार्ट फेल है,
धकमपेल है, धकमपेल है......

सभी पूछते,
यार बनेगी किसकी?
दिल्ली में
सरकार बनेगी किसकी?
सबकी गुल्लक में गुलेल है
धकमपेल है, धकमपेल है......

हर गिरोह में
हैं भाटों के भटवा,
नेता जी के चटवा,
हर गिरोह में
बड़े-बड़े मुड़कटवा
मोदी का तो खुला खेल है
धकमपेल है, धकमपेल है......

प्रतिभा जी से
कहें सोनियां, बहना साथ निभाना
इसी समय के लिए
दिया था राष्ट्रपती का बाना
मंद-मंद मुस्काकर
प्रतिभा बोलीं, मत घबराना
चिल्लाने दो एनडीए को
तुम सरकार बनाना,
सूद समेत चुका दूंगी मैं
....और तभी से-
टकलू जी का हार्ट फेल है
धकमपेल है, धकमपेल है......


तोता होता तो क्या होता/रघुवीर सहाय

अगर कहीं मैं तोता होता
तोता होता तो क्या होता?
तोता होता।
होता तो फिर?

होता, 'फिर' क्या?
होता क्या? मैं तोता होता।
तोता तोता तोता तोता
तो तो तो तो ता ता ता ता
बोल पट्ठे सीता राम....

गुलामी

मनुष्य के कल्याण के लिए
पहले उसे इतना भूखा रखो कि वह औऱ कुछ
सोच न पाए
फिर उसे कहो कि तुम्हारी पहली ज़रूरत रोटी है
जिसके लिए वह गुलाम होना भी मंज़ूर करेगा
फिर तो उसे यह बताना रह जाएगा कि
अपनों की गुलामी विदेशियों की गुलामी से बेहतर है
और विदेशियों की गुलामी वे अपने करते हों
जिनकी गुलामी तुम करते हो तो वह भी क्या बुरी है
तुम्हें रोटी तो मिल रही है एक जून।

बदलो

उसने पहले मेरा हाल पूछा
फिर एकाएक विषय बदलकर कहा आजकल का
समाज देखते हुए मैं चाहता हूँ कि तुम बदलो
फिर कहा कि अभी तक तुम अयोग्य साबित हुए हो
इसलिए बदलो,
फिर कहा पहले तुम अपने को बदलकर दिखाओ

तब मैं तुमसे बात करूंगा।

लाखों का दर्द
लखूखा आदमी दुनिया में रहता है
मेरे उस दर्द से अनजान जो कि हर वक़्त
मुझे रहता है हिन्दी में दर्द की सैकड़ों
कविताओं के बावजूद

और लाखों आदमियों का जो दर्द मैं जानता हूँ
उससे अनजान
लखूखा आदमी दुनिया में रहे जाता है।

सुकवि की मुश्किल
ये और आया है एक हल्ला, जो बच सकें तो कहो कि बचिए
जो बच न पायें तो क्या करूँ मैं, जो बच गये तो बहुत समझिए
सुकवि की मुश्किल को कौन समझे, सुकवि की मुश्किल सुकवि की मुश्किल
किसी ने उनसे नहीं कहा था कि आइए आप काव्य रचिए।

Wednesday, May 13, 2009

सोलह मई के जूजू

आज अंतिम चरण का मतदान समाप्त हो रहा है. 15वीं लोकसभा का प्रसव -काल समापन की ओर है. नवजात सरकार को लेकर सभी दलों की अपनी-अपनी प्रसव-पीड़ाएं चरम पर हैं. सभी अपनी-अपनी सउरी (प्रसव-कक्ष) के झरोखों से बाएं-दाएं झांक रहे हैं. पैदा होने वाला शिशु चेहरे-मोहरे में किस पर जाएगा, किसके जैसा होगा, इस तरह के प्रश्न मतदाताओं को कम, उन पुरोहितों को ज्यादा मथमथा रहे हैं, जिनकी बारहों महीने लार टपकती रहती है. जो कुर्सी के बिना किसी काम के कम, बेकाम के ज्यादा होते हैं. या कहिए पूरे समाज पर बोझ होते हैं.
कुछ सवाल ऐसे भी हैं, जो बड़े ही पते के हैं और अंदर-ही-अंदर मतदाताओं को भी खूब गुदगुदा रहे हैं (जैसे वोडाफोन के जूजू). सोलह मई को वोटिंग मशीने किसकी हथेली पर पोटी करेंगी, और किसकी हथेली पर सोनहलवा परोसेंगी....इसी बेचैनी का सबब बन रहे हैं ये सवाल.

1. क्या मायावती एनडीए के पाले में होंगी?
2. क्या मुलायम-लालू-पासवान यूपीए के दड़बे में घुस जाएंगे?
3. क्या वामपंथी लालपीला होने की नौटंकी करते हुए फिर कांग्रेस के उसमें प्रविष्ट हो जाएंगे?
4. क्या जयललिता थर्ड फ्रंट का राग अलापते-अलापते उमा भारती का चोला ओढ़ लेंगी?
5. ....और....क्या....मध्यावधि चुनाव होंगे?

जहां तक अपुन की समझ में आ रहा है, केंद्र सरकार का गठन जल्दी से नहीं होने जा रहा है. मायावती और जयललिता एनडीए के साथ होंगी. वामपंथी चौथे मोरचे के साथ कांग्रेस के साथ होंगे. लालपंथी बाहर से बिना शर्त समर्थन देंगे, बाकी लालू-कालू सरकारी मलाई खाने के लिए झपट पड़ेंगे. एनडीए की सरकार किसी कीमत पर नहीं बनेगी. राष्ट्रपति सोनिया गांधी के किचन-कैबिनेट से निकली हैं. सबसे ज्यादा सीटें कांग्रेस को मिलने जा रही हैं, इसलिए पहले वह कांग्रेस को ही सरकार बनाने के लिए बुलाएंगी और छोटे-मोटे चूहे दौड़ कर कांग्रेस के साथ हो लेंगे. वैसे राजनीति में कुछ भी ठीक-ठीक अनुमान लगा पाना असंभव होता है.

यदि कांग्रेस को बुलावा मिलता है तो संभव है कि मायावती एनडीए की अंगुली पकड़ने की बजाय बाहर से उस वक्त की प्रतीक्षा करें, जब अमर कुछ बकें, सपा से कांग्रेस की रार बढ़े और मलाई सरपोटने के लिए वह लपक पड़ें. एक बात और अंतिम चरण का मतदान संपन्न होते ही आजम खां को सपा से खदेड़ दिया जाएगा. क्योंकि अमर ने मुलायम को जो हिरोइनों का चस्का लगा दिया है, वह लागी नाही छूटे रामा, चाहे जिया जाय रे..........

...तो देखिए 16 मई के बाद भारतीय लोकतंत्र के ये जूजू कैसे-कैसे गुल खिलाते हैं.

Tuesday, May 12, 2009

संसद..... देश का सबसे बड़ा चोर बाजार

भारतीय संसद को चोरों का बाजार कहें तो किसी को गलत नहीं लगना चाहिए. आरएसएस वाले और सत्ताजीवी भारतीय कम्युनिस्ट जिस सिद्धांत और नैतिकता की बातें करते हैं, उसमें खाटी दोगलापन के अलावा और कोई जमीनी हकीकत नहीं है. इनके टुकड़ों पर पलने वाले बुद्धिजीवी मीडिया के कोटरों में बैठकर इनके चेहरे सजाते संवारते रहते हैं.
आजकल तरह-तरह के पत्रकार भी इनके पीछे लार टपका रहे हैं. कोई संघी बनता है, कोई प्रगतिशील. वातानुकूलित गाड़ियों से निकल कर ये चैनलों के एसी रूम में बुद्धी बघारते रहते हैं. ये लंपट बुद्धीबाज ही चोर संसदमार्गियों पर बहसों का बाजार खड़ा करते रहते हैं. उनका चैनल चलता रहता है और इनका नाम खूसट चिंतकों में शुमार होता रहता है. लोकतंत्र का अजब तमाशा चल रहा है. जोकरों और लंपटों से पूरा दिल्ली ठसाठस भरा पड़ा है.
अब ये चोर-चोर मौसेरे भाई रात-दिन एक ही बात चिल्ला रहे हैं, किसकी सरकार बनेगी, कौन प्रधानमंत्री बनेगा. ताकि जिसकी सरकार बने उसके पीछे लग लिया जाए और कुछ कमाई-धमाई का पांच साल के लिए इनका भी जुगाड़ बने. इस रेस में चैनल वालों, प्रिंट मीडिया वालों, बिल्डरों, रैकेटियरों, ठेकेदारों, दलालों ने अपने-अपने घोड़े छोड़ रखे हैं. घोड़े यानी टाई वाले दलाल.
उधर, चोरों की जमात भी कुर्सीखोरी का नया खेल खेलने में मशगूल हो चुकी है. सब कह रहे हैं हमारी सरकार बनेगी या सिर्फ हमारे समर्थन से सरकार बनेगी. सरकार बनने का मतलब होगा, पांच साल के लिए लूट का रास्ता साफ. यह बात भी गले में फंसी होगी कि सरकार नहीं बनी तो जो पूंजीपतियों से करोड़ों रुपये चुनावी चंदा लेकर घमासान किया है, वह रकम कहां से लौटाएंगे. फिलहाल सर्कस चालू है. इस बार 16-17 मई का सटर्डे-संडे होगा मजेदार. दिल्ली में देश भर के भांट जुटेंगे. सत्ता का जोगीरा गाएंगे और उछल-उछल कर मीडिया वाले भी खूब मजेदार नौटकियां दिखाएं......
...इंडिया टीवी पर दिखेंगे धूर्त मुस्कान बिखेरते रजत शर्मा
.... देश भर का पकवान भकोस कर एनडीटीवी पर डकार लेते वृत्तमुखी दुआ
......स्टार न्यूज पर बेमतलब गला फाड़-फाड़ कर रेंकते चौरसिया
आदि-आदि...देखियेगा और सोचियेगा कि लाख-दो-लाख रुपयों के पैकेज के चक्कर में ये लजीज पत्रकार कैसे-कैसे शाब्दिक झूठन-जूठन व्यंजन परोसते हैं.

Monday, April 20, 2009

पढ़िए बनारस के कविवर नामवर सिंह की कविताएं


मेरी कविता में दृष्टि दोष

दोस्त, देखते हो जो तुम अंतर्विरोध सा

मेरी कविता कविता में, वह दृष्टि दोष है।

यहाँ एक ही सत्य सहस्र शब्दों में विकसा

रूप रूप में ढला एक ही नाम, तोष है।

एक बार जो लगी आग, है वही तो हँसी

कभी, कभी आँसू, ललकार कभी, बस चुप्पी।

मुझे नहीं चिंता वह केवल निजी या किसी

जन समूह की है, जब सागर में है कुप्पी

मुक्त मेघ की, भरी ढली फिर भरी निरंतर।

मैं जिसका हूँ वही नित्य निज स्वर में भर कर

मुझे उठाएगा सहस्र कर पद का सहचर

जिसकी बढ़ी हुई बाहें ही स्वर शर भास्वर

मुझ में ढल कर बोल रहे जो वे समझेंगे

अगर दिखेगी कमी स्वयं को ही भर लेंगे।




बुरा जमाना, बुरा जमाना

बुरा ज़माना, बुरा ज़माना, बुरा ज़माना

लेकिन मुझे ज़माने से कुछ भी तो शिकवा

नहीं, नहीं है दुख कि क्यों हुआ मेरा आना

ऎसे युग में जिसमें ऎसी ही बही हवा

गंध हो गई मानव की मानव को दुस्सह।

शिकवा मुझ को है ज़रूर लेकिन वह तुम से--

तुम से जो मनुष्य होकर भी गुम-सुम से

पड़े कोसते हो बस अपने युग को रह-रह

कोसेगा तुम को अतीत, कोसेगा भावी

वर्तमान के मेधा! बड़े भाग से तुम को

मानव जय का अंतिम युद्ध मिला है चमको

ओ सहस्र जन-पद-निर्मित चिर पथ के दावी!

तोड़ अद्रि का वक्ष क्षुद्र तृण ने ललकारा

बद्ध गर्भ के अर्भक ने है तुम्हें पुकारा।

Friday, April 17, 2009

गुरू! वो देखो चुनाव हो रिया हइ..हीहीहीही



1
जैसे ही
चुनाव आयोग ने
चुनाव आचार संहिता का बिगुल बजाया
तो
नेता जी के शैतानी दिमाग़ ने
अपना अलग रास्ता बनाया
और
नेता जी को समझाया
अब छोडो मेरा साथ ,मेरा कहना
और कुछ दिन केवल
दिल के अधीन ही रहना
नेता जी
जो कभी-कभी
कविता लिखने का शौंक फरमाते थे
और
कभी-कभी अपने दिमाग़ के कारण
समीक्षक भी कहलाते थे
वही दिमाग
अब नेता जी को समझाता है
अरे !
चुनाव अभियान में
समीक्षक नहीँ
कवि ही काम आता है
कवि हो
तो उसका फायदा क्यो नहीँ उठाते
कुछ ऐसे नारे क्यों नहीँ बनाते
जिसमे हो
कुछ झूठे वादे,कसमे और लारे
जिसमे
फँस जाएँ भोले-भाले लोग बेचारे
बस
कुछ दिन मे तो
चुनाव खतम हो जायेगी
और
तेरी-मेरी फिर से
मुलाकात हो जाएगी
फिर
हम दोनो मिलकर करेंगे राज
और करेंगे दिल के मरीजों का इलाज
नेता जी
घबराये और बोले
तेरे बिना मै क्या कर पाऊँगा?
यूँ ही दिल के हाथो मर जाऊँगा
अरे!
मेरे होते तू क्यों घबराता है?
नेता का दिल भी तो
उसका दिमाग़ ही चलाता है
बस
फरक सिर्फ इतना है
कि दिल को थोड़े दिन्
रखना दिमाग से आगे
और
देखना लोग आएँगे
तुम्हारे पीछे भागे-भागे
बस
उनको दिल कि बातों से
बस में करना
और
दिमाग से नामान्कन भरना
होगा
तो वही जो तुम चाहोगे
पहले भी
लोगो को मूर्ख बनाया
आगे भी बनायोगे
जीतोगे
और तुम्हे सम्मान भी मिल जायेगा
लोगों की मूर्खता का
प्रमाण मिल जायेगा
लेकिन
इस बार नेता जी के
दिमाग़ ने धोखा खाया
लोगो ने अपना दिमाग चलाया
और
नेता जी को
बाहर का रास्ता दिखाया
नेता जी
जो स्वयम को समझते थे
समाज का आईना
अब
स्वयम को
समाज के आईने मे पाया

(हिंद युग्म से साभार)


2.
आजकल राजनीति एक रैलगाडी बन गई है
जिसका आने- जाने का टाइम टेबल तो है
टाइम टेबल तो.. सिर्फ दिखावे के लिए है
हक़ीकत मे.. रेलगाड़ी घंटो लेट आ रही है
इसी तरह.... राजनीति मे रोज़ राजनेता
जनता जनार्दन को.......मूर्ख बनाते है
नित .नए - नए सब्ज़ बाग़ दिखा रहे है
गर चुनाव मे जीत गए... समझा रहे है
तो ये करवा देंगे तो..... वो करवा देंगे
तो ये दिलवा देंगे तो.... वो दिलवा देंगे
चुनाव जीतने के बाद ...राजनेता फिर से
राजनीति की..गाड़ी के ड्राईवर बन जाते है
देश मे यहा वहां नाचते गाते मौज मनाते है
अगले चुनावो तक क्षेत्र से..ग़ायब रहते है
चुनाव आते ही नकली मुखैटा चेहरे पर लगाकर
जनता को चराने धोखा देने हाज़िर हो जाते है.

(nirantar से साभार एक अनाम लेखक की कविता)

3
मदारी: जमूरे!
जमूरा: हाँ उस्ताद.
मदारी: खेल दिखायेगा?
जमूरा: सच्चा की झूठा?
मदारी: झूठा तो बहुत देखा पब्लिक ने. अब सच्चा दिखा.
जमूरा: फिर तो फरमाईशी कार्यक्रम होगा. बोल उस्ताद क्या दिखाऊँ?
उस्ताद, इलेक्शन का टाइम है, कुछ उसी पर दिखा.
जमूरा: उस्ताद, इलेक्शन का नाम मत लो (..और रोने लगता है).
मदारी: अब्बे, क्या हो गया? बाप मर गया या माँ भाग गयी?
जमूरा: बाप तो तू ही है और तेरी बीवी भागे तो मेरे ठेंगे से.
मदारी: तो क्या हुआ?
जमूरा: मैं इलेक्शन में खडा होने वाला था पर अब नहीं.
मदारी: बाप से मजाक करता है?
जमूरा: नहीं उस्ताद, सच कह रहा हूँ. मैं इलेक्शन में खडा होने वाला था.
मदारी: चल मान लेता हूँ, फिर क्या हुआ?
जमूरा: मैंने पब्लिक को बोला मैं हिन्दू हूँ, पब्लिक की बहन ने अन्दर कर दिया.
मदारी: ये तो बुरा हुआ. चल जाने दे. खेल दिखा.
जमूरा: अब तो मैं जेल में हूँ. (कह कर भाग खड़ा होता है).

मदारी: जमूरे!
जमूरा: हाँ उस्ताद.
मदारी: तुमने सुना?
जमूरा: क्या उस्ताद?
मदारी: चुनाव होने वाला है.
जमूरा: हाँ उस्ताद, मैं भी खड़ा हूँ.
मदारी: मजाक मत कर.
जमूरा: वो तो पब्लिक से करूंगा.
मदारी: क्या सोच कर खड़ा हुआ?
जमूरा: प्रधानमंत्री बनना है.
मदारी: औकात में रह.
जमूरा: उस्ताद, एक बात बोलूँ?
मदारी: बोल.
जमूरा: एक प्रधानमंत्री जमूरा बन गया तो एक जमूरा प्रधानमंत्री क्यों न बने?
मदारी: खेल ख़त्म हुआ पैसे मांग.
जमूरा: नहीं मिलता है उस्ताद अभी रिसेस्सन है
मदारी: स्विस बैंक से मांग
जमूरा: पच्चीस लाख करोड़ तो अपने हैं, वही न उठा कर दे दें.

(परिचर्चा से साभार)