Saturday, January 30, 2010

कुलाधिपति प्रो.नामवर सिंह और कुलपति विभूतिनारायण राय के जातिवादी कारनामे




ठाकुर साहब
राय साहब
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वर्धा
जले या महाराष्ट्र, राहुल का नामांकन नहीं होगा!
देश भर में धर्मनिरपेक्ष प्रशासक की छवि निर्मित करने वाले पुलिस अधिकारी विभूति नारायण राय के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में कुलपति बनने के बाद दलितों का उत्पीड़न तेजी के साथ बढ़ा है। क्या कोई धर्मनिरपेक्षवादी जातिवादी नहीं हो सकता है? दलित उत्पीड़न की ऐसी शर्मनाक घटनाएं एक नई बहस खड़ी करती हैं। और सवाल उठाती हैं उस प्रगतिशीलता तथा कम्युनिज्म पर भी, जिसकी पहचान भुनाते रहे हैं वर्धा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति तथा कथित आलोचक डॉ.नामवर सिंह और कुलपति विभूति नारायण राय।
कुछ इस तरह शुरू होती है वर्धा विश्वविद्यालय में दलित उत्पीड़न की कहानी। विश्वविद्यालय के अनुवाद विद्यापीठ में राहुल कांबले ने एम फिल की परीक्षा में टॉप ( स्वर्ण पदक) किया लेकिन पीएचडी में उसका नामांकन नहीं किया गया। अनुवाद विद्यापीठ में दो विद्यार्थियों का ही नामांकन करने का फैसला विश्वविद्यालय ने किया। पीएच.डी. के लिए चयनित विद्यार्थियों में राहुल कांबले को तीसरे नंबर पर दिखाया गया, लेकिन जब चयनित दो विद्यार्थियों में से एक विद्यार्थी ने अनुवाद विद्यापीठ में पीएचडी में नामांकन नहीं लिया तो राहुल ने अपना दावा पेश किया। लगातार तीन महीने तक उसे प्रताड़ित किया गया। उसने नामांकन की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए सूचना के अधिकार के तहत विश्वविद्यालय प्रशासन से जानकारी मांगी थी। अनुवाद विद्यापीठ के डीन प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव ने सूचना का अधिकार कानून का इस्तेमाल करने की आड़ लेकर राहुल का नामांकन लेने से मना कर दिया। राहुल कुलपति विभूति नारायण राय के समक्ष अपनी फरियाद लेकर गया, लेकिन कुलपति ने बजाय उसके साथ न्याय करने के प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव से माफी मांगने का निर्देश दिया। राहुल ने प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव से चार बार माफी मांगी। उनके पैर तक पकड़े, लेकिन कुलपति ने नामांकन की स्वीकृति नहीं दी। आखिरकार राहुल ने आंदोलन करने की चेतावनी दी। आम्बेडकर स्टूडेंट्स फोरम ने राहुल के मामले को उठाया। 8 दिसंबर को विश्वविद्यालय ने दीक्षांत समारोह का आयोजन किया था। दलित छात्रों ने उसका बहिष्कार किया। दलित छात्रों का बड़ा हिस्सा दीक्षांत समारोह में दिए जाने वाले पदकों को लेने नहीं गया। उसी दिन राहुल कांबले आमरण अनशन पर भी बैठ गया। उसके बाद उसके समर्थन में कई दलित छात्र क्रमवार अनशन पर बैठने लगे। जबकि दीक्षांत समारोह में शामिल होने के लिए आए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष डा. सुखदेव थोरात ने अनशन कर रहे विद्यार्थियों के पास जाकर उनके प्रति अपनी सहानुभूति प्रगट की। लेकिन डा. थोरात के कहने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन राहुल का नामांकन लेने को तैयार नहीं हुआ। विद्यार्थियों ने कुलाधिपति नामवर सिंह से भी मुलाकात की। उन्होंने कहा कि दलितों का जितना नामांकन गांधी के विश्वविद्यालय में होता है, उतना अम्बेडकर विश्वविद्यालयों में भी नहीं होता होगा। डा. नामवर सिंह से विद्यार्थियों ने अनशन स्थल पर आने का अनुरोध किया लेकिन दो दिनों तक अनशन स्थल से सौ कदम की दूरी पर रहने के बावजूद वे अनशनकारी विद्यार्थियों से मिलने नहीं गए। कुलपति लगातार कई दिनों तक अनशन स्थल के बगल से ही सुबह टहलने के लिए निकलते रहे, लेकिन उन्होंने विद्यार्थियों से मिलने व बातचीत करने की जरूरत नहीं महसूस की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी छह माह और छह वर्ष तक भी आंदोलन करेंगे तो उनका नामांकन नहीं हो सकता है। प्रति कुलपति मानवशास्त्री डा. नदीम हसनैन को यह दुख हुआ कि विद्यार्थियों के अनशन की वजह से उन्हें सुबह टहलने का अपना रास्ता बदलना पड़ा। ट्रेड यूनियन आंदोलन की पृष्ठभूमि वाले विशेष कर्तव्य अधिकारी राकेश (श्रीवास्तव) ने कहा कि वर्धा जले या महाराष्ट्र या हिन्दुस्तान, राहुल का नामांकन नहीं किया जाएगा। दलित विद्यार्थी लगातार संघर्ष करते रहे।
इतना ही नहीं, कुलपति की और भी कई जातिवादी करतूतें हैं। पिछले सत्र में विभूति नारायण राय के कार्यभार संभालने के बाद विश्वविद्यालय में जेआरएफ पाने वाले पहले छात्र संतोष बघेल को तुलनात्मक साहित्य में पीएचडी में नामांकन देने से मना कर दिया गया। संतोष विश्वविद्यालय में पदक प्राप्त मेधावी छात्र रहा है। नामांकन नहीं किए जाने की स्थिति में संतोष बघेल को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा। दलित विधार्थियों ने जिला प्रशासन के सामने जाकर अनशन किया। लेकिन अनशन के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन का एक भी प्रतिनिधि उनसे मिलने नहीं गया। तब विश्वविद्यालय परिसर में संगठन बनाना और आंदोलन करना भी संभव नहीं था। पुलिस कुलपति का एक भय पूरे वातावरण में व्याप्त रहता था। बाद में उन विद्यार्थियों ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग समेत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के समक्ष गुहार लगायी और बताया कि पिछले तीन वर्षों से आरक्षण नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। साहित्य में पहले पीएचडी में यदि दलित छात्रों के नामांकन हुए तो उन्हें किसी दलित शिक्षक के तहत ही शोध कराने की अघोषित व्यवस्था हनुमान प्रसाद शुक्ला के समय में रही है। 2009 में जनसंचार विभाग में पीएचडी में प्रवेश परीक्षा हुई और उसके बाद इंटरव्यू लिए गए। जिस पैनल ने ये प्रक्रिया पूरी की, उसमें संस्कृति विद्यापीठ के डीन, विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर, एक रीडर, एक विशेषज्ञ और अनुसूचित जाति एवं जनजाति की बतौर प्रतिनिधि एक रीडर थी। उस समय दस विद्यार्थियों को पीएचडी में लेना था। जब परीक्षा परिणाम आया तो उसमें पिछड़े, दलित विद्यार्थियों की तादाद ज्यादा थी। वे आरक्षण की सीट से ज्यादा सामान्य वर्ग के रूप में भी सफल घोषित किए गए। तब दस सीटों के लिए नामांकन करने की घोषणा की गई थी, लेकिन वे परीक्षा परिणाम रद्द कर दिए गए। दोबारा परीक्षा आयोजित की गई। दोबारा परीक्षा की प्रक्रिया किस तरह से पूरी की गई, गौरतलब है। विश्वविद्यालय से बाहर के एक शिक्षक ने ही प्रश्न पत्र तैयार किया। परीक्षा की कॉपी जांची और वहीं इंटरव्यू में बैठा। इस बार अनुसूचित जाति एवं जनजाति का प्रतिनिधि पैनल में नहीं था। परीक्षा परिणाम तीन दिनों की प्रक्रिया में ही निकाल दिया गया। इस परीक्षा परिणाम में ज्यादा सवर्ण विद्यार्थियों को चयनित किया गया। मजे की बात कि इस पैनल में विभाग के एक भी शिक्षक को नहीं रखा गया। सीटों की संख्या भी दस से तेरह कर दी गई।
कुलपति की एक और जातीय करतूत। दिसंबर 6, 2009 को आम्बेडकर स्टूडेंट्स फोरम ने महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर मोमबत्ती यात्रा का कार्यक्रम आयोजित किया। यात्रा विश्वविद्यालय परिसर से होकर वर्धा स्थित आम्बेडकर प्रतिमा तक गई। इसमें दलित विद्यार्थियों के अलावा अन्य विद्यार्थी शामिल हुए, लेकिन पहली बात तो ये हुई कि इस यात्रा में विश्वविद्यालय के एक मात्र दलित प्रोफेसर लेल्ला कारुण्यकारा भी शामिल हुए तो उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। आरोप लगाया गया कि उन्होंने जातीय नारे लगाए। नारे थे -ब्राहम्णवाद मुर्दाबाद, मनुवाद मुर्दाबाद , जातिवाद मुर्दाबाद आदि। प्रोफेसर कारुण्यकारा को दिए गए नोटिस में कहा गया कि उन्होंने परिसर का वातावरण दूषित किया। उन्हें सात दिनों के भीतर जवाब देने के लिए कहा गया। ये भी चेतावनी दी गई कि यदि सात दिनों के भीतर जवाब नहीं दिया गया तो एकतरफा कार्रवाई कर ली जाएगी। ये नोटिस खुद विभूति नारायण राय ने जारी किया। दूसरी बात कि उसी दिन विश्वविद्यालय ने भारत-ईरान कलाओं के लोक आख्यान कार्यक्रम आयोजित किया। वह रविवार का दिन था। तीसरी बात कि शाम को लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा के लिए विश्वविद्यालय के गांधी हिल्स पर एक अलग कार्यक्रम आयोजित किया गया। दिसंबर 6, 2008 को बाबासाहेब आम्बेडकर दलित एवं जनजाति अध्ययन केन्द्र ने महापरिनिर्वाण दिवस मनाने का फैसला किया था। कार्यक्रम के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन से तीन हजार रूपये की मांग की गई थी। लेकिन दो हजार रूपये ही स्वीकृत किए गए और उसी दिन पुस्तकालय में इससे अलग कविता पाठ का एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसका असर ये हुआ कि 6 दिसंबर 2009 को दलित जनजाति अध्ययन केन्द्र ने कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया। दलित एवं जनजाति अध्ययन केन्द्र की बिल्डिंग के शिलान्यास पत्थर को गिरा दिया गया। इसका शिलान्यास विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष सुखदेव थोरात ने 22 फरवरी 2007 को किया था। इसका दोबारा शिलान्यास कराने की योजना बनी और राज्यपाल आरएस गवई को 2 दिसंबर 2009 को आमंत्रित किया गया, लेकिन वह नहीं आए। आज भी वो शिलान्यास पत्थर कूड़े के ढेर के समान पड़ा हुआ है। डा. आम्बेडकर दलित एवं जनजाति अध्ययन केन्द्र के भवन के निर्माण के लिए एक करोड़ रूपये मिले थे, लेकिन उसका इस्तेमाल दूसरी बिल्डिंग बनाने में कर दिया गया। कुलपति विभूति नारायण राय ने कार्यभार संभालने के बाद तीन शिक्षकों को चार कारण बताओ नोटिस जारी किया और वे सभी शिक्षक दलित एवं आदिवासी हैं। कुलपति विभूति नारायण राय ने अपने कार्यकाल में एक वर्ष के अंदर पचास से ज्यादा अस्थायी बहालियां कीं, उनमें एक भी दलित एवं आदिवासी नहीं है।
प्रगतिशील लेखकों में शुमार कुलपति विभूतिनारायण राय की जातीय करतूतों की दास्तान यहीं खत्म नहीं होती। दलित छात्र-छात्राओं के खिलाफ जातिगत पूर्वाग्रहों को कई बार घटनाओं के रूप में सामने रखना संभव नहीं हो पाता है। ऐसी न जाने कितनी बातें हैं, जो केवल दलित महसूस करता है कि उसके साथ जातिगत भेदभाव किया जा रहा है। दलित विद्यार्थियों का आठ महीने तक राजीव गांधी फेलोशिप रोके रखा गया। कुलपति ने विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के दलित नेताओं को लम्पट कहा। कुलपति ये कहते हैं कि दलित इस विश्वविद्यालय में केवल फैलोशिप के लिए आते हैं। सहायक रजिस्ट्रार (वित्त) सुशील पखिडे वित्त के एक मात्र स्थायी अधिकारी हैं, लेकिन उन्हें वित्त से हटा दिया गया और डिस्टेन्स ( दूरस्थ शिक्षा विभाग) में भेज दिया गया। आयुष छात्रावास के छात्र के रूप में अमरेन्द्र शर्मा के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज है। उन्हें आयुष छात्रावास का ही वार्डेन बना दिया गया। जब विद्यार्थियों ने विरोध किया तो दूसरे छात्रावास का वार्डेन बना दिया गया। विश्वविद्यालय में किसी विद्यार्थी को फेल नहीं किया गया है, लेकिन दलित एवं जनजाति अध्ययन केन्द्र के तीन विद्यार्थियों को फेल कर दिया गया।
एक तरफ तो दलितों के उत्पीड़न की ऐसी शिकायतें है तो दूसरी तरफ जातिवाद के कुछ और नमूने भी देखे जा सकते हैं। विश्वविद्यालय के शांति एवं अहिंसा विभाग के अस्सिटेंट प्रोफेसर मनोज राय को दिल्ली सेंटर का प्रभारी बनाया गया। नियमत: ये गलत है। इन महोदय को वेतन वर्धा में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए दिया जाता है, लेकिन ये महोदय कक्षा नहीं लेते हैं, बल्कि उन्हें दिल्ली में मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के डिलिंग के काम में लगाया गया है। तीसरी बात कि कुलपति स्वंय को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं, लेकिन मनोज राय घोषित तौर पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े रहे हैं। मनोज राय ने सूचना के अधिकार के तहत बतौर सूचना अधिकारी सूचना लेने की फीस दस रुपये से बढ़ाकर नियमों के विपरीत पचास रुपये कर दिया था। चूंकि वे स्वजातीय हैं, इसीलिए उनके लिए सब क्षम्य है और वे इनाम पाने के हर तरह से हकदार हैं। विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग का प्रमुख डा. अनिल कुमार राय अंकित को बनाया गया है। वे दक्षिणपंथी विचारों के हैं। उनके नाम से छपी दर्जनों किताबों के बारे में पूरे देश में ये छपा है और चैनलों में दिखाया गया है कि उन्होंने अपनी किताबें दूसरे लेखकों की किताबों से सामग्री चुराकर छापी हैं। उन्हें चोर गुरु के रूप में सभी जानते हैं। कुलपति को भी ये सब पता है। उनके यहां बकायदा शिकायत दर्ज करायी गई है। ये सब तथ्य डा. अंकित की नियुक्ति के समय भी उनके सामने मौजूद थे, लेकिन ये उनके स्वजातीय हैं, इसीलिए उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने के बजाय दीक्षांत समारोह के लिए उन्हें हजारों का बजट देकर मीडिया प्रभारी बना दिया गया।


दलित होने पर अनिल चमड़िया को हटाया वीएन राय ने

(भड़ास4मीडिया से साभार)

वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर पद से हटाए गए जाने-माने पत्रकार अनिल चमड़िया का कहना है कि विश्वविद्यालय की जिस एक्जीक्यूटिव कमेटी (ईसी) ने उन्हें हटाने का फैसला लिया, उसमें 18 सदस्य हैं लेकिन केवल आठ अपने करीबी लोगों के साथ बैठक करके कुलपति विभूति नारायण राय ने मनमाना निर्णय करा लिया. वीएन राय ने ईसी की बैठक इसी उद्देश्य से दिल्ली में रखी ताकि वे अपने लोगों के साथ बैठकर इच्छित फैसला करा सकें. ईसी की इस बैठक में जो आठ सदस्य शामिल हुए, उनमें मृणाल पांडे भी हैं जो मेरी विरोधी रही हैं. वीएन राय के दो-तीन स्वजातीय लोग हैं. अनिल चमड़िया ने एक न्यूज पोर्टल से सविस्तार बातचीत में कहा कि ''जिस दिन से मैं यहां आया हूं, वीएन राय मेरे पीछे पड़े हुए हैं. मेरे आते ही उन्होंने मुझसे कहा कि मैं स्टूडेंट्स से हाथ नहीं मिलाऊं, स्टूडेंट्स के हास्टल नहीं जाऊं. जुलाई महीने में मैं वर्धा पहुंचा था और अगस्त महीने में वीएन राय ने मुझसे इस्तीफा देने के लिए कह दिया. आरोप लगाया कि मैं सुबह से रात तक शराब पीता हूं. चाय पीने की बात चली थी तो मैंने कहा था कि मैं काली चाय पीता हूं. इसको वीएन राय ने शराब पीने से जोड़ दिया और आरोप जड़ा कि मैं दिन भर शराब पीता रहता हूं. हद है यह तो. मैं दिल्ली में इतने साल रहा हूं. कोई कह दे कि मैं दिन भर शराब पीता रहता हूं. उन्होंने आरोप लगाया कि मैं हीटर पर खाना बनाता हूं. आठ-आठ आदमी मेरे यहां खाते हैं, मेस चलाता हूं. बताइए, ऐसी बातों और आरोपों को आप क्या कहेंगे. मैं अगर लोगों से मिलता जुलता हूं. लोग मेरे यहां आते हैं तो इसमें आपको क्या दिक्कत. मेरे खिलाफ जितना प्रोपेगंडा कर सकते थे, वीएन राय ने किया.
उन्होंने बताया कि वीएन राय का अस्सी फीसदी वक्त तो मेरे खिलाफ साजिशें-प्रोपेगंडा करने में बीतता है. उनकी कोशिश हमेशा यही रही कि वे मुझे यहां से निकाल दें. इसीलिए उन्होंने अपने एक आदमी के जरिए मेरी नियुक्ति के खिलाफ नागपुर में हाईकोर्ट में मुकदमा करा रखा है. मैं कोर्ट को बताऊंगा कि जब मामला चल रहा है तो उन्होंने मुझे बीच में ही कैसे हटा दिया. दूसरी महत्वपूर्ण बात, जिस आधार पर विवि की ईसी ने मुझे हटाया है, उस आधार पर तो 12 लोगों को हटाया जाना चाहिए. सिर्फ मुझे ही क्यों हटाया गया.डिग्री का कोई मामला नहीं है क्योंकि नियुक्तियों में यूजीसी के दो तरह के प्रावधान होते हैं. एक डिग्रीधारियों की नियुक्ति होती है तो बिना डिग्रीधारियों की भी होती है. बिना डिग्री धारियों के लिए कई पैमाने होते हैं. जैसे उनका संबंधित फील्ड में कांट्रीव्यूशन क्या है, शोध क्या है आदि आदि. बिना डिग्रीधारी पैमाने पर मैं फिट बैठता हूं. अगर आप कह रहे हैं कि गलत क्राइटेरिया पर नियुक्ति हो गई तो उस गलत क्राइटेरिया पर मैं ही क्यों, नियुक्त हुए 12 लोग आएंगे. तो बाकी लोग क्यों नहीं हटाए गए? 1998, 2000 और फिर 2009 में यूजीसी की तरफ से नियुक्ति के लिए जो प्रावधान जारी किए गए, उसी का हवाला देकर मुझे हटाया गया जबकि इन प्रावधानों पर मैं खरा उतरता हूं. आपने कहा कि 1998 के यूजीसी के प्रावधान के आधार पर विज्ञापन निकाला था जो गलत था, इसे 2000 के प्रावधान के आधार पर होना चाहिए था. तो फिर जिन 12 लोगों की नियुक्ति गलत प्रावधान के आधार पर की, उन सभी को हटाया जाना था. सिर्फ मुझे इसलिए हटाया क्योंकि वीएन राय मुझे हटाना चाहते थे. इसीलिए नियम-कायदे को ताक पर रखकर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए मुझे हटा दिया. मेरी नियुक्ति वीएन राय ने यहां पढ़ रहे लड़कों की इच्छा पर की थी. उन्होंने लड़कों से पूछा था कि किसे आप चाहते हो टीचर बनाया जाए. लड़कों ने मेरा नाम लिया. मैं वर्धा में 2004 से पढ़ाने आ रहा हूं. स्टूडेंट्स मुझे चाहते रहे हैं. स्टूडेंट्स ने मेरा नाम लिया. तो मेरी नियुक्ति में केवल वीएन राय की इच्छा नहीं थी बल्कि उन पर स्टूडेंट्स का दबाव भी था. मैं भी छात्रों को पढ़ाने, नई चीजें सिखाने, एक अच्छी पीढ़ी पत्रकारिता में लाने जैसी इच्छाएं पाले हुए दिल्ली छोड़कर वर्धा चला गया. कौन जाता है अपनी बसी-बसाई गृहस्थी छोड़कर पराए शहर. इसे मेरा शौक कहिए या पागलपन. मैंने आते ही कहा कि यहां पत्रकारिता डिपार्टमेंट में अखबार नहीं है, टीवी नहीं है, रेडियो नहीं है, इंटरनेट नहीं है. कैसे चलता है डिपार्टमेंट. सारी व्यवस्थाएं कराने में जुट गया. यह सब वीएन राय को बुरा लगा. मैं हमेशा डिपार्टमेंट बनाने की बात करता रहा हूं और इसके लिए छात्रों की तरफ से लड़ता रहा. मैंने स्टूडेंट्स को गांव में रिपोर्टिंग करने के लिए भेजा. 15 हजार रुपये खर्च आ रहे थे. वीएन राय ने कहा कि यह तो बहुत ज्यादा है, केवल छह हजार रुपये दूंगा. पर उन्होंने छह हजार रुपये भी नहीं दिए. छात्र अपने खर्चे पर बसों से गांव जाते और लौटते. छह हजार रुपये के लिए फाइल घूमती रही पर कुलपति वीएन राय के उस पर दस्तखत आज तक नहीं हुए.
उन्होंने बताया कि जिस स्वजातीय को पत्रकारिता विभाग का एचओडी बना रखा है, वह कितना विवादित शख्स है, इसे दुनिया जानती है. उस पर चोरी करके किताबें लिखने जैसे कई गंभीर आरोप हैं पर उसे वीएन राय का पूरा प्रोटेक्शन मिला हुआ है. जातिवाद खूब चल रहा है. कहीं न कहीं सवर्ण मानसिकता भी काम कर रही है. मैं दलित हूं और दलित आंदोलनों को हमेशा से समर्थन देता रहा हूं. यह भी वीएन राय को मंजूर नहीं था. वे चाहते थे कि मैं उनके हिसाब से रहूं, उनकी हां में हां मिलाऊं. वर्धा में दलित छात्रों ने वीएन राय के रवैए के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन किया. एक महीने तक लगातार आंदोलन चला. पूरा देश जानता है कि मैं दलितों के लिए लड़ता रहा हूं. मेरा तीस साल का सार्वजनिक जीवन है. मेरी अपनी छवि है. मेरा काम करने का अपना तरीका है. मैं छात्रों को बनाने आया था, दलाल पैदा करने नहीं. पीएचडी में दलित ज्यादा उत्तीर्ण हो गए तो मेरे पर वीएन राय ने आरोप लगा दिया कि मैंने रिजल्ट में धांधली की है. हद है यह तो. ऐसी बातें लगातार मेरे खिलाफ की जाती रही हैं. मेरा तो केवल यही पूछना है कि जब एक्जीक्यूटिव कमेटी 18 लोगों की है तो आपने 8 अपने नामिनेट किए हुए लोगों से ही कैसे फैसला करा लिया. वीएन राय के कामकाज के तरीके कारण ही विष्णु नागर ने ईसी से अपना इस्तीफा दे दिया था.अनिल चमड़िया के बारे में विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय का कहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं था कि अनिल चमड़िया दलित हैं। इसी से जुड़ा जवाब हो सकता है कि यूनिवर्सिटी की नई स्थायी-अस्थायी नियुक्तियों में कितने राय के स्वजातीय हैं, यह तो उन्हें मालूम है।

1 comment:

श्याम कोरी 'उदय' said...

....ये सब बरदास्त क्यों कर रहे हैं लोग, ऎसे लोगों को सबक सिखाना चाहिये ताकि इस तरह का पुन: साहस न कर सकें!!!!