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Tuesday, March 23, 2010

संसद में बम!



किसने फेंका संसद में बम?
कब
फेंका था?
कैसे
फेंका था?
कैसा
था बम?
क्या
हुआ बम फेंकने के बाद?
जिस
समय बम फेंका गया, उस समय संसद में क्या हो रहा था?
जब
आतंकवाद दुनिया के सिर चढ़कर बोल रहा हो, ऐसे में संसद में बम फेंकने की बात कितनी दहशत भरी लगती है? आजादी की लड़ाई के समय ऐसा क्यों नहीं लगा था, जब शहीद भगत सिंह ने संसद में बम फेंक कर गोरी हुकूमत के बहरे कानों को गर्म कर दिया था?

............कुछ ऐसे ही सवालों के साथ

23 मार्च 2010 खत्म होने से एक घंटे पूर्व.........................
तीन सवाल एक साथ मन को मथने लगे..............
1- शहीद भगत सिंह होते तो क्या आज संसद में बम फेंकना चाहते?
2-- कानू सान्याल ने आत्महत्या के लिए आज ही का दिन क्यों चुना?
3---डॉ। राम मनोहर लोहिया होते तो क्या समाजवादी पार्टी संसद में परमाणु समझौते का समर्थन करते?
..........काफी माथा मारने के बावजूद तीनों सवालों का कोई जवाब न सूझा। जिन्हें सूझे यहां अपनी टिप्पणी प्रेषितकर सकते हैं।


फिलहाल इन कतरनों को पढ़ते जाइए.........

‘आदमी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मरने के बाद उसके साथ क्या किया जाता है, लेकिन जीवित लोगों कोइससे काफी फर्क पड़ता है।’ शहीद-ए-आजम भगत सिंह की प्रतिमा संसद में लगाने को लेकर हुए वाद-विवाद सेतीन सदी पहले टामस पेन द्वारा लिखी उक्त पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं। बहरी ब्रिटिश सरकार को जनता कीआवाज सुनाने के लिए भगत सिंह ने 8 अप्रैल को सेंट्रल असेम्बली हाल में बम फेंका और गिरफ्तारी दी थी। तबउन पर मुकदमा चला और सजा हुई। अब उसी संसद परिसर में उनकी 18 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा लगी है। यहइतिहास की अनोखी गति है कि जिसे ब्रिटिश साम्राज्य ने राष्ट्रद्रोही करार दिया आज वही देशभक्ति का सिरमौर है।यहां बात प्रतिमा लगाने की नहीं, प्रतिमा की वेशभूषा से जुड़ी है। प्रतिमा लगाने का प्रस्ताव सांसद (अब खेलमंत्री) एमएस गिल और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम ने रखा था। दोनों ने प्रतिमा का खर्च उठाने काभरोसा दिलाया था, जो अच्छी बात है। चकचक तब हुई जब सलीम ने फिरंगी हैट- मूंछ तथा गिल ने पगड़ीधारीभगत सिंह की प्रतिमा बनाने की बात की। भगत सिंह व्यक्ति नहीं, विचार हैं, इसीलिए उन्हें शहीद-ए-आजम मानाजाता है। जो आदमी किशोरावस्था में ही भगवान से बागी हो गया हो (उनका लेख- मैं नास्तिक क्यों हूं), जो देश हीनहीं, दुनिया की भी फिक्र करता हो, जो सरकार नहीं व्यवस्था बदलने में भरोसा रखता हो उसे पगड़ी और हैट केविवाद में कैसे घसीटा जा सकता है? भगत सिंह की मौत उनके जीवन से बड़ी बन गई थी। नौजवान पीढ़ी को भगतसिंह का संदेश स्पष्ट था ‘जीवन इतना प्यारा व शांति इतनी मीठी कभी नहीं हो सकती कि उसे गुलामी की कीमतपर खरीदा जाए।’ (दैनिक हिंदुस्तान से)



आज मेरी ड्यूटी हर रोज की तरह असेंबली गैलरी में थी। दिन के करीब साढ़े 12 बजे असेंबली हाल में एक के बादएक दो बम फटे और पिस्टल से कुछ फायर भी किए गए। जब मैं भाग कर वहां पहुंचा तो वहां पर वैरी सार्जेट साहबने दो मुलाजिमान को गिरफ्तार कर रखा था। जिन्होंने अपना नाम भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त बताया। यहमजमून है भगतसिंह के खिलाफ दर्ज प्राथमिका का। प्राथमिकी में यह बयान दिया था ड्यूटी पर तैनात ड्यूटीकांस्टेबल ने। जिसके बयान के आधार पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था।मुकदमा संख्या 113 है। एफआईआर की मूल प्रति उर्दू में लिखी गई है, आठ अप्रैल 1929 को लिखी गई इसप्राथमिकी की कई जगह इंक मिट चुकी है, जिससे बयान देने वाले ड्यूटी कांस्टेबल का नाम नहीं पढ़ा जा सका है।विशेषज्ञों ने बहुत प्रयास के बाद पाया है कि यह नाम करम है। उसके सरनेम को लेकर असमंजस है। नई दिल्लीथाना (अब पार्लियामेंट थाना) में विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया और दोनोंक्रांतिकारियों को आरोपी बनाया। इसके बाद उन पर एक पुलिस अफसर की पिस्तौल से हत्या करने का आरोपलगाकर 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई। इनके साथ ही क्रांतिकारी राजगुरु और सुखदेव को भी लाहौर सेंट्रलजेल (अब पाकिस्तान) में एक साथ फांसी दी गई। इन दोनों क्रांतिकारियों ने ही सेंट्रल लैजिस्लेटिव असेंबली केचैंबर में बम फेंका था और वहीं पर आत्मसमर्पण कर दिया था। उस समय की यह असेंबली अब संसद भवन केअंदर है। जहां पर बम फेंका गया था अब वहां पर ऐसा कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। सरकार के इस रवैये परइतिहासकारों में नाराजगी है। बम गिरने वाला स्थान पार्लियामेंट थाने से 400 मीटर की दूरी पर है। आपको बता देंकि भगत सिंह को लेकर अब देश की राजधानी दिल्ली में यादें ही शेष हैं। वे सब प्रमाण मिट चुके हैं जो इतिहास केगवाह थे। भगतसिंह बटुकेश्वर दत्त को गिरफ्तार कर जिस नई दिल्ली सेंट्रल जेल में रखा गया था। यह इमारत अबढह चुकी है और अब इसके स्थान पर शहीद स्मारक बनाया गया है। जो दिल्ली गेट के पास मौलाना आजादमेडिकल कालेज की मुख्य इमारत के पास स्थित है। वर्तमान में इसे फांसी घर पुरानी दिल्ली जेल का नाम दियागया है। इस स्मारक पर प्रति वर्ष शहीदों की याद में आयोजन होता है। इतिहास में इस प्रकार के साक्ष्य मौजूद हैंकि असेंबली में बम फेंककर भगतसिंह का किसी को नुकसान पहुंचाने का उद्देश्य नहीं था। अंग्रेजों ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था और वे हर कीमत पर इन तीनोंक्रांतिकारियों को ठिकाने लगाना चाहते थे। लाहौर षड्यंत्र (सांडर्स हत्याकांड) में जहां पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमाचलाया गया वहीं अंग्रेजों ने सुखदेव के मामले में तो सभी हदें पार कर दीं और उन्हें बिना जुर्म के ही फांसी परलटका दिया। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चमन लाल का कहना है कि सांडर्स हत्याकांड में सुखदेवशामिल नहीं थे फिर भी ब्रितानिया हुकूमत ने उन्हें फांसी पर लटका दिया। भगत और सुखदेव दोनों एक ही वर्ष मेंलायलपुर में पैदा हुए और एक ही साथ शहीद हो गए। चमन लाल ने बताया कि चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व मेंपब्लिक सेफ्टी और ट्रेड डिस्प्यूट बिल के विरोध में असेंबली में बम फेंकने के लिए जब हिंदुस्तान सोशलिस्टरिपब्लिकन आर्मी की पहली बैठक हुई तो उसमें सुखदेव शामिल नहीं थे। बैठक में भगत ने कहा कि बम वहफेंकेंगे, लेकिन आजाद ने उन्हें इजाजत नहीं दी और कहा कि संगठन को उनकी बहुत जरूरत है। दूसरी बैठक मेंजब सुखदेव शामिल हुए तो उन्होंने भगत सिंह को ताना दिया, 'शायद तुम्हारे भीतर जिंदगी जीने की ललक जागउठी है, इसीलिए बम फेंकने नहीं जाना चाहते।' इस पर भगत ने आजाद से कहा कि बम वह ही फेंकेंगे और अपनीगिरफ्तारी भी देंगे। चमन लाल ने बताया कि अगले दिन जब सुखदेव बैठक में आए तो उनकी आंखें सूजी हुई थीं।वह भगत को ताना मारने की वजह से सारी रात सो नहीं पाए थे। (दैनिक जागरण से)

..............................वो 8 अप्रैल 1929 का दिन था जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश भारत के असेम्बलीहॉल में बम फेंककर अवाम की आवाज़ बहरे हुक्मरानों को सुनाने की कोशिश की थी। इसी ‘गुनाह’ के चलते भगतसिंह को फांसी दे दी गई। अब भगत सिंह दोबारा पहुंच गए हैं इसी भव्य इमारत में जो अब भारतीय संसद भवनबन गई है। जब भगत सिंह की 18 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा संसद भवन के परिसर में लगाई गई। सोचिए, 61 साललग गए आज़ाद भारत की सरकार को भगत सिंह का सम्मान करने में। वैसे इसका श्रेय लोकसभाध्यक्ष सोमनाथचटर्जी को भी दिया जाना चाहिए क्योंकि यह प्रतिभा लोकसभा सचिवालय ने ही दान दी है। इस मौके पर उस पर्चेका एक अंश पेश है, जिसे भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में फेंका था... ''हम हर मनुष्य के जीवन कोपवित्र मानते हैं। हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें हर इंसान को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता काअवसर मिल सके। हम इन्सान का ख़ून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। लेकिन क्रांति द्वारा सबको समानस्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ-न-कुछ रक्तपातअनिवार्य है।'' (एक हिंदुस्तानी की डायरी से)