Monday, February 9, 2009

विज्ञान ने खोली प्रेम-संबंधों के ढोल की पोल


प्यार-व्यार लव-रसायन
जब विज्ञान चुटकी भर प्यार की पोल खोल दे तो क्या यह संत वेलेन्‍टाइन की तौहीन होगी. शायद नहीं. प्रेम न राजा देखता है, न रंक. यह किसी को भी, किसी से भी, किसी भी उम्र में हो जाता है. नेशनल जियोग्राफ़िक चैनल अपने नेकिड साइंस कार्यक्रम में मानवीय प्रेम का वैज्ञानिक तौर पर विश्लेषण करते हुए बताता है कि प्रेम कोई दिखावे की फितरत नहीं. दिमाग़ में होने वाला केमिकल परिवर्तन है. जब कोई प्रेमासक्त होता है, उसके दिमाग़ के एक ख़ास हिस्से में अलग तरह की रासायनिक क्रियाएँ होती हैं. जैसी कि कोकीन खाने से. दोनों के लक्षण समान होते हैं. इसी तरह समाधि भी कोई पराभौतिक क्रिया नहीं. ध्यान से दिमाग़ में रासायनिक परिवर्तन होते हैं. जिन लोगों की खोपड़ी में ये रासायनिक परिवर्तन ज़्यादा हो जाते हैं, वे ऐनलाइटेण्ड कहलाते हैं. उन्हें कुछ अजीब तरह की अनुभूति होती है. वैसी अनुभूति टेम्परेरी तौर पर एलएसडी नामक ड्रग के सेवन से भी होती है. प्रेमासक्ति के दौरान मस्तिष्क में दो प्रकार के रसायनों की भरमार होती है. करीब आने पर ऑक्‍सीटोसिन और दूर जाने पर डोपामिन. रोलर कोस्‍टर राइट के दौरान ऑक्‍सीटोसिन लड़ने की ताकत देता है और इसके स्राव के ठीक बाद डोमामिन का सीक्रेशन होता है. डोपामिन की तरलता में दो प्रेमियों का प्‍यार पलता है. कहा जाता है कि आदमी तीन जगह सर्वाधिक मूर्खताएं करता है. गोद में बैठे बच्‍चे के साथ, गोद में रखे शीशे के साथ और गोद में पसरी प्रेमिका के साथ. तीनों अवस्‍थाओं में आदमी की बुद्धि कुंद हो जाती है. ऐसा ही कुछ शेक्‍सपीयर कहता है कि प्रेमी मीठी बेवकूफियां करते हैं और उनके अलावा सभी लोगों को ये बेवकूफियां दिखती हैं.
आज भी वैज्ञानिकों की एक अंतर्राष्ट्रीय टीम मानव मस्तिष्क के अध्ययन से यह जानने के लिए प्रयासरत है कि उसमें दूसरे लिंग के प्रति लगाव की भावना कैसे जागृत होती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रेम वास्तव में एक ड्रग के समान है, जिससे नशा चढता है. यानी एक समय ऐसा आ सकता है, जब इस तरह की गोली या स्प्रे विकसित कर लिया जाए, जिससे प्रेम की अनुभुति जागृत हो. इस विषय पर कई शोध हुए हैं. एक शोध से यह साबित हुआ है कि ऑक्सीटोशीन हार्मोन के स्प्रे से इंसान के अंदर दूसरे लिंग के व्यक्ति के प्रति लगाव की भावना उत्पन्न होती है, शायद वह दिन दूर नहीं, जब बाजार में इस तरह के “लव स्प्रे” भी वैलेनटाइन डे पर बिकने लगें. कहते हैं कि प्रेम दिल से होता है लेकिन विज्ञान ने साबित कर दिखाया है कि प्रेम मस्तिष्क की एक अवस्था का नाम है. प्रेम हो जाए तो एक-दूसरे के बिना जीना दुश्वार हो जाता है. खुशबू की तरह प्रेम को छिपाया नहीं जा सकता. प्रेमिका अपने प्रेमी के बदन की खुशबू को पहचान लेती हैं. बदन की खुशबू उसके जींस पर निर्भर करती है. खुशबू सेक्स हॉर्मोन फेरोमोन्स का उत्पाद है. ओव्यूलेशन की क्रिया के दौरान महिलाओं के सूंघने की शक्ति बढ़ जाती है. तब प्रेमिका को प्रेमी की गंध आकर्षित करती है. विशेष देह गंध इस्ट्रोजन के स्तर को बढ़ा कर सेक्स की इच्छा में इजाफा कर देती है. लोग कहते हैं कि आदमी प्रेम हो जाने पर बौरा जाता है. वैज्ञानिक सच तो यह है कि ऐसी अवस्था में वह पहले की अपेक्षा ज्यादा समझदार हो जाता है. जिस प्रकार हम किसी मादक पदार्थ या दवा के आदी हो जाते हैं और उसके न मिलने पर शरीर के हॉर्मोनल स्त्रावों में परिवर्तन होने लगता है, उसी प्रकार प्रेमावस्था में शरीर में हार्मोनल परिवर्तन होते हैं. प्रेम भावना मस्तिष्क की स्थिरता और विवेक में चमत्कारिक परिवर्तन ला देती है. प्रेम बंधन में बंधने के बाद किसी के संबंध ही नहीं, स्वास्थ्य में भी सुधार होता है. प्रेम करने वाले लोग उन लोगों के मुकाबले शारीरिक रूप से ज्यादा स्वस्थ और खुश रहते हैं, जो अविवाहित और प्रेम से अनजान हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार प्रेम-संबंध हृदय रोग के खतरे टालने में मददगार होते हैं.

मस्तिष्क में श्रृंखलाबद्ध क्रिया
प्रेमासक्ति के दौरान मस्तिष्क अलग तरह से सक्रिय होता है. दिल, दिमाग पर हावी हो जाता है. इसके वैज्ञानिक प्रमाण सामने आ चुके हैं. योरपीय मनोचिकित्सक डोरोथी टेनाय ने 400 लोगों का अध्ययन कर यह जानने की कोशिश की कि पहला प्यार होने पर उन्हें कैसा महसूस हुआ था. सभी ने माना कि उस अनुभूति के समय वह जैसे हवा में उड़ रहे थे. पूरे शरीर में नशा- सा फैलने लगा. प्रिय के पास पहुँचते ही दिल की धड़कन में खास तरह का बदलाव महसूस हुआ. शोधकर्ताओं ने प्यार होते समय इस पूरी श्रृंखलाबद्ध क्रियाओं को समझने की कोशिश की. 'फिनाइल इथाइल एमाइन' यानी 'पीईए' रसायन को 'लव रसायन' के रूप में जाना जाता है. यही वह रसायन है जो रोमांस के समय दिमाग में सुरूर पैदा करता है. प्रेमासक्ति के दौरान इस रसायन का स्राव पूरे शरीर में होता है. इंद्रियाँ इतनी क्रियाशील हो जाती हैं कि कम रोशनी में भी सब कुछ साफ-साफ दिखाई पड़ने लगता है, जिस समय आप घर में ऊँघ रहे होते हैं, उस समय अजीब चुस्ती-फूर्ती का अहसास होता है. इस रसायन की एक गैररोमांटिक खुराक शरीर में सक्रिय हो जाती है. जिस तरह कि तेज झूला झूलते समय, ऊँचाई से नदी में छँलाग लगाते हुए, चॉकलेट खाने या तेज मोटरसाइकल चलाते समय शरीर में एक विशेष प्रकार की उत्तेजना होती है. शोधकर्ता मानते हैं कि यह आनंद ऐसे ही रसायन के कारण ही होता है. 'पीईए' से एक अवयव न्यूरोकैमिकल डोपामाइन भी निकलता है. प्रेमासक्ति में इसकी क्या भूमिका होती है? इस पर रोचक प्रयोग हो चुके हैं. चूहों में सूँघकर पता लगाने की असाधारण क्षमता होती है. तमाम रोगों के अलावा अपने साथी को प्रजनन के उपयुक्त होने न होने का पता भी चूहे सूँघकर लगा लेते हैं. एक प्रयोग में शोधकर्ताओं को पता चला कि जिस भी चूहे को डोपामाइन की अतिरिक्त मात्रा इंजेक्शन दी गई, मादा चुहिया ने उसे चुन लिया. इससे साफ था कि उसके अंदर डोपामाइन का अतिरिक्त रिसाव हो रहा था. इसी डोपामाइन से ऑक्सीटोन नामक रसायन निकलता है. महिलाओं में खास परिस्थितियों में इस रसायन का महत्वपूर्ण प्रभाव होता है. शोधकर्ता मानते हैं कि प्रेमियों के आपस में एक-दूसरे को बाँहों में भर लेने और चूमते समय निकलने वाले ये रसायन वास्तव में महिलाओं को मातृत्व की तैयारी करवा रहे होते हैं. इन रसायनों को पालन-पोषण करने वाला रसायन भी कहा जाता है. इसी तरह शोधकर्ताओं ने प्यार करने वालों के दिल में धक्‌-धक्‌ होने का वैज्ञानिक कारण भी खोज निकाला है. जब युवा उसके पास पहुँचते हैं, जिसे वे दिलोजान से ज्यादा चाह रहे होते हैं तो उनका दिल ऐसे धड़कने लगता है जैसे वह उछलकर बाहर आ जाएगा. विशेषज्ञ कहते हैं कि इस समय मस्तिष्क में नोरेपाइनफ्रीन नामक सरायन का स्राव हो रहा होता है. यही रसायन एड्रेरनालाइन हारमोनों को उत्तेजित कर देता है. इसके ही प्रभाव से जब प्रेमी अथवा प्रेमिका एक-दूसरे के पास पहुँचते हैं तो उनका दिल तेजी से धड़कने लगता है. हम अपने सामान्य क्रियाकलापों के लिए दिमाग के 'कोरटेक्स' क्षेत्र का इस्तेमाल करते हैं जबकि भावनात्मक निर्णयों के लिए 'लिम्बिक तंत्र' जिम्मेदार होता है. रोमांस के समय मनुष्य के अंदर जिस पीईए रसायन के स्राव की बात करते हैं वस्तुतः ये सब रसायन लिम्बिक तंत्र में ही अपना असर दिखाते हैं. योद्धाओं को जब बहादुरी दिखाने का समय आता है तो ऐसे ही कुछ अन्य तरह के रसायन मस्तिष्क के लिम्बिक तंत्र को अपनी पकड़ में ले लेते हैं. भावनात्मक संबंधों के समय मनुष्य का लिम्बिक तंत्र वाला हिस्सा अचानक सक्रिय हो उठता है. वैज्ञानिक दृष्टि से कहा जाए तो वहाँ दिल, दिमाग में नहीं बल्कि छाती में पसलियों के बीच कहीं पंप की तरह खून धौंकने में लगा होता है. धीरे-धीरे दिमाग इन रसायनों का आदी हो जाता है या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कुछ सालों बाद नई मुलाकात की तरह प्रेमी-प्रेमिकाओं का दिल नहीं धड़कता.
'डोपामाइन' से उथल-पुथल
प्रेम में अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ होती हैं. वैज्ञानिकों ने इस बात का भी पता लगा लिया है कि जब किसी को प्रेम होता है तो उसके दिमाग़ पर क्या असर होता है. उन्होंने ऐसे पुरुषों और महिलाओं की रासायनिक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया, जिनके नए-नए प्रेम संबंध बने थे. सोसायटी फ़ॉर न्यूरोसाइंस के इस शोध में मस्तिष्क के उन हिस्सों में उथल-पुथल का पता चला, जो ऊर्जा से संबद्ध हैं. स्कैन करने पर महिलाओं के दिमाग़ में भावनात्मक प्रभाव देखा गया और पुरुषों के दिमाग़ में कुछ ऐसी हलचल थी जो यौनोत्तेजना से जुड़ी हुई थी. शोधकर्ताओं ने 17 युवा लड़कों और लड़कियों के दिमाग़ की स्कैनिंग करके यह देखने का प्रयास किया कि प्यार होने पर उनके दिमाग़ में क्या बदलाव आता है. उन्हें बारी-बारी ऐसे लोगों के चित्र दिखाए गए जिनसे वे प्रेम करते थे और वे भी जिनके साथ उनका भावनात्मक जुड़ाव नहीं था. बीच-बीच में उन्हें ऐसे काम भी बताए गए जिनसे उनका ध्यान बंटता रहे. पाया गया कि प्रेम होने पर उनके मस्तिष्क में 'डोपामाइन' का स्तर बढ़ा. 'डोपामाइन' दिमाग़ में बनने वाला एक रसायन है जो संतोष और आनंद की भावनाओं को जन्म देता है. जब इसका स्तर बढ़ जाता है तो ऊर्जा में वृद्धि हो जाती है और इंसान आमतौर पर उत्साहित महसूस करता है. लेकिन पुरुषों और महिलाओं में प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग थीं. अधिकतर महिलाओं में दिमाग़ के उस हिस्से में बदलाव देखा गया जो भावनाओं से संबद्ध होता है. लेकिन अधिकतर पुरुषों में उत्तेजना बढ़ाने वाले बदलाव नज़र आए. अब शोध चल रहा है कि जिन लोगों को उनके प्रेमी या प्रेमिकाओं ने ठुकरा दिए, उनके दिमाग़ की क्या स्थिति होती है?
बेवफ़ा बना देने वाला जीन
वैज्ञानिक कहते हैं कि बेवफाई भी जीन की माया होती है. बेवफ़ाई शरीर के विशेष जीनों का नतीजा होती है. यह दावा लंदन के सेंट थॉमस अस्पताल के ट्विन रिसर्च यूनिट को प्रोफ़ेसर टिम स्पेक्टर ने किया. उन्होंने महिलाओं पर अध्ययन किया. प्रोफ़ेसर स्पेक्टर के अनुसार यदि जुड़वां बहनों में से एक अपने पार्टनर के साथ बेवफ़ाई करती हो तो इस बात की 55 फ़ीसदी संभावना है कि दूसरी भी ऐसा ही करेगी. प्रयोगों से पता चला कि 100 में से 23 महिलाएं अपने पार्टनर के साथ पूरी तरह वफ़ादार नहीं रहीं. प्रोफ़ेसर स्पेक्टर ने यह भी पाया कि जुड़वां में से दोनों बहनों या दोनों भाइयों के वफ़ादार या बेवफ़ा होने की बराबर की संभावना रही. स्पेक्टर को लगा कि जीनों का एक समूह ऐसी चारित्रिक विशेषताओं के लिए ज़िम्मेदार होता है. किसी एक जीन को वफ़ादारी या बेवफ़ाई से नहीं जोड़ा जा सकता. जीन का सिद्धांत देने के साथ-साथ स्पेक्टर ने यह भी कहा कि बेवफ़ाई जीनों के अलावा कई सामाजिक कारकों पर भी निर्भर करती है. सामाजिक मनोवैज्ञानिक डॉ. पेट्रा बॉयन्टन भी सामाजिक कारकों के सिद्धांत से सहमत हैं. बॉयन्टन कहते हैं कि यदि एक बच्चे के रूप में किसी को देखने को मिले कि कैसे उसकी माँ उसके पिताजी को धोखा दे रही है तो उस आचरण की नकल करना उसके लिए आसान हो जाता है.
प्यार-व्यार में हो गए अंधे
प्यार अंधा होता है, यह कहावत मात्र नहीं. वैज्ञानिक तथ्यों ने यह साबित कर दिया है. यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लंदन के एक अध्ययन के अनुसार प्रेमालाप से मस्तिष्क की उन हरकतों पर अंकुश लग जाता है, जो किसी को आलोचनात्मक नज़र से देखती हैं. उस व्यक्ति के क़रीब होने पर दिमाग़ ख़ुद-ब-ख़ुद यह तय करने लगता है कि उसके चरित्र और व्यक्तित्व का कैसे आकलन किया जाए. शोधकर्ताओं ने यह भी जान लिया है कि मस्तिष्क पर इस तरह का असर रोमांस के दौरान भी होता है और ममता जाग उठने पर भी. माँ की ममता भी बच्चे की अच्छाइयां ही देख पाती है. माँ का बच्चे से लगाव भी कुछ इसी तरह का प्रभाव पैदा करता है. उस समय नकारात्मक भावनाएं दब जाती हैं. शोधकर्ताओं के दल ने 20 युवा माताओं के दिमाग़ का उस समय अध्ययन किया, जब उन्हें उनके अपने बच्चों और उनके परिचितों के बच्चों के चित्र दिखाए गए. उन्होंने पाया कि उस समय मस्तिष्क की गतिविधियाँ कुछ ऐसी ही थीं, जैसी रोमांटिक युगल की होती हैं. दोनों अध्ययनों से पता चला कि उस समय दिमाग़ की कुछ ऐसी ही स्थिति होती है जैसी अचानक धन मिल जाने या अच्छा खाने-पीने के समय होती है. इसी तरह के परिणाम जानवरों में भी देखने में आए. अनुसंधान से यह भी पता चला कि रोमांटिक और ममता से जुड़ी भावनाओं में एक बुनियादी फ़र्क़ है. प्रेमी-प्रेमिका के दिमाग़ के उस हिस्से में भी गतिविधियाँ तेज़ हो जाती हैं जो सेक्स उत्तेजना से संबद्ध हैं.
पहली नजर में प्यार-व्यार
वैज्ञानिकों की खोज पर यकीन करना ही होगा. उन्हें इस बात के सबूत मिले हैं कि वास्तव में प्यार पहली नजर में होता है. एक-दूसरे से मिलने के दौरान कुछ ही मिनट में युगल फ़ैसला कर लेते हैं कि वे एक-दूसरे के साथ किस तरह का रिश्ता चाहते हैं. 'जर्नल ऑफ़ सोशल एंड पर्सनल रिलेशनशिप्स' में छपे ओहायो विश्वविद्यालय के एक शोध से इस वास्तविकता का पता चला. इस विश्वविद्यालय ने एक ही लिंग के छात्रों के 164 जोड़ों पर ध्यान केंद्रित किया. ये शोध 'डेटिंग' या मिलन पर भी लागू हुआ. शोधकर्ताओं में से एक प्रोफ़ेसर आर्टिमियो रामिरेज़ ने बताया कि हम सब किसी भी व्यक्ति को देखते ही सोच लेते हैं कि हम उससे किस तरह का रिश्ता चाहते हैं. यदि हम दोस्ती करना चाहता हैं तो सामने वाले से ज़्यादा बातें करना चाहेंगे. अपने बारे में ज़्यादा जानकारी देना चाहेंगे और कुछ इस तरह सक्रिय हो जाएंगे कि तुरंत दोस्ती हो जाए. यदि किसी रिश्ते को लेकर सकारात्मक रवैया नहीं तो कम बातचीत करेंगे और उसे पनपने नहीं देंगे. यह सब तुरत-फुरत में घट जाता है, यानी कुछ ही मिनट में हो जाता है. लोग चुटकी बजाते ही फ़ैसला कर लेते हैं कि कुछ ही क्षण पहले मिले व्यक्ति के साथ वे कैसा बर्ताव करना पसंद-नापसंद करेंगे.
प्यार-व्यार का फ़ार्मूला
प्यार कामदेव का तीर है या कोई अद्भुत नशा? सवाल अब पेंचीदा नहीं रहा. प्रोफेसर एप्सटेन ने भी प्यार की व्याख्या के लिए नए प्रयोग किए. प्रयास किए कि प्यार को कैसे पैदा किया जाए. ठीक उसी तरह जिस तरह कोई वाद्य यंत्र सीखा जाता है, लोगों के दिलों में प्यार की हिलोरें पैदा की जाएँ. अमरीकी एप्सटेन ने एक ऐसी प्रक्रिया तैयार की, जिसमें छह महीनों में एक दूसरे के प्रति प्यार पैदा किया जा सके. उन्होंने यह साबित करना चाहा कि प्यार एक शारीरिक प्रक्रिया है. प्रायः लोग एक-दूसरे को समझने का प्रयास जब तक करते हैं, देर हो चुकी होती है और शादी अथवा संबंध टूट चुका होता है. जोड़े स्वर्ग में नहीं, यहीं पृथ्वी पर बनते-बिगड़ते हैं. ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कॉलिन बैल्कमोर के अनुसार जब लोग अपना साथी चुनते हैं, वे अनचाहे अपने बच्चों के पिता को चुनते हैं. इसमें प्यार कहीं फिट नहीं होता. लेकिन प्रोफेसर एप्सटेन कहते हैं कि ज्यादातर सफल शादियाँ तय की हुई होती हैं. वे भारत का उदाहरण देते हैं कि वहाँ तय शादियाँ बेहद सफल होती हैं और तलाक़ की दर मामूली होती है. यहाँ लोग शादी के बाद प्यार करना सीखते हैं. चार बच्चों के तलाक़शुदा पिता प्रोफेसर एप्सटेन ने प्यार के अपने प्रयोग के लिए जब एक विज्ञापन जारी किया तो सबकी निगाहें उनके प्रयोग, प्यार के फ़ॉर्मूले पर जा टिकी थीं.
जब उनका जिया जले
यह एक अध्ययन का एक और खुलासा है. जिन लोगों के दोनों हाथों या दोनों पैरों का आकार एक जैसा नहीं होता, यानी एक दूसरे से कुछ बड़ा या छोटा होता है, उनमें जलन या ईर्ष्या की प्रवृत्ति ज़्यादा होती है. कुछ लोगों में हक़ जताने की आदत ज़्यादा होती है. कनाडा के शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के लोग आमतौर पर दूसरे पर ज़्यादा हक़ जमाते हैं और उनमें जलन का माद्दा ज़्यादा होता है. वैसे पहले कुछ अनुसंधानों में कहा गया था कि जिन लोगों का एक हाथ दूसरे से बड़ा होता है वे विपरीत लिंग के लोगों को ज़्यादा आकर्षित नहीं करते और उनकी संतानोत्पत्ति की क्षमता भी कम होती है. गर्भावस्था के दौरान भ्रूण में हार्मोन के अंसतुलन की वजह से कभी-कभी जो बच्चे पैदा होते हैं, उनका एक पैर दूसरे से बड़ा होता है. हैलीफ़ैक्स स्थित डलहौज़ी विश्वविद्यालय में अनुसंधानकर्ताओं विलियम ब्राउन और उनके सहयोगियों ने पाया कि इस तरह के लोगों में ईर्ष्या भी ज़्यादा होती है. उन्होंने समलिंगी और विपरीत लिंग के साथ संबंध बनाने वाले पचास पुरुषों और महिलाओं का अध्य्यन किया. उन्होंने उनके हाथों, पैरों और कानों जैसे शारीरिक अंगों का जायज़ा लिया और उनसे कुछ ऐसे सवाल पूछे जिनसे यह पता चले कि वे अपने प्रेम संबंधों में कितने ईर्ष्यालु हैं. इस शोध के अनुसार उन्हें शारीरिक असमानता और ईर्ष्या मे काफ़ी हद तक सामंजस्य नज़र आया. इस अध्ययन में एक ख़ास बात यह पता चली कि यह जलन या ईर्ष्या रोमांटिक संबंधों तक ही सीमित थी, यानी कामकाज में यह नज़र नहीं आती थी.

Thursday, February 5, 2009

प्रेम के पांच रंग तस्वीरों में





हीर-रांझा, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट

दिल दीवाना माने ना
वन डे लव

वैलेंटाइन डे मनाने की प्रथा रोम से प्रचलित हुई. इस दिन वैलेंटाइन नाम के धर्मगुरु शहीद हुए थे. रोम में इनके शरीर को दफनाने के बाद कुछ प्रेम के पहरेदार इनको संत के रुप में जानने लगे और धीरे-धीरे वैलेंटाइन नाम का प्रेम-पत्र, शुभेच्छा कार्ड देने की प्रथा शुरु हो गई. यूरोप के विश्वविध्यालय से शुरु हुई यह प्रथा धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैल गई और हर जगह वेलेन्टाइन डे प्रेम पर्व के रुप में मनाया जाने लगा. वेलेंटाइन डे को यादगार बनाने के लिए लवर्स एक दूसरे को तोहफे देते हैं. सब अपने प्यार को दिल का ही तोहफा देना चाहते हैं. एक दिन पहले शहर की कार्ड व गिफ्ट गैलरियों में युवाओं की भीड़ लग जाती है. हार्ट शेप गिफ्ट आइटमों की ज्यादा डिमांड होती है. टेडीबियर से लेकर कार्ड तक में हर जगह हार्ट शेप पर नजर होती है. कोई डेढ़ से दो हजार रुपये तक के म्यूजिकल कार्ड खरीदता है तो कोई बॉक्स कार्ड. हर कार्ड पर प्यार की कोटेशन. हर पेज पर तितलियों और फूलों की बात. वैलेंटाइन डे को यादगार बनाने के लिए प्रेमी युगल खास तैयारियां करते हैं. किसी के फैशन में वैस्टर्न वियर शुमार होता है तो किसी की पसंद होती है जींस के साथ कुर्ती. कोई स्कर्ट के साथ शार्ट या सैमी शार्ट टॉप रैड और ओरेंज कलर में पहनना चाहता है तो कोई ड्रैस के साथ मैचिंग एक्सैसरीज में डूब जाता है. मेक-अप पर भी खास ध्यान होता है.
इश्क की मुश्किलों भरी राह पर चलने वाले हीर-रांझा, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट जैसे प्रेमियों को दुनिया आज भी याद करती है. लेकिन कहते हैं कि उनका प्रेम अवसाद, अविवेक, असंसारिकता जैसी चीजों के नीचे दबा हुआ था. जिसके जीवन का उद्देश्य ही सिर्फ़ एक स्त्री हो, उसके लिए तो वैलेंटाइन डे ठीक है, मगर ‘प्यार से भी जरूरी कई काम हैं, प्यार सब कुछ नहीं आदमी के लिए. वैलंटाइंस डे वाले इश्क-विश्क की दौड़ में हिंदुस्तानी एशिया में नंबर दो पर चल रहे हैं. 68.5 फीसदी भारतीय अपने महबूब से प्यार का इजहार करने के लिए इस दिन को चुनते हैं. यहां की महिलाएं चाहती हैं कि इस दिन का खर्च उनका प्रेमी उठाए. वैलंटाइंस डे मनाने में फिलिपीन नंबर वन है. इस दिन पैसे सबसे ज्यादा सिंगापुर, चीन और कोरिया के लोग खर्च करते हैं. सबसे मक्खीचूस थाइलैंड के आशिक होते हैं. एक सर्वे में 21 फीसदी महिलाओं का कहना था कि हमारे प्रेमी वैलंटाइंस डे पर हम पर 500 से 5,000 डॉलर तक खर्च करें, जबकि पुरुषों की तरफ से सिर्फ 7 फीसदी ने महिलाओं से खर्च की उम्मीद रखी. 38 फीसदी भारतीयों ने कहा कि हम अगली बार ज्यादा पैसे खर्च करेंगे. देश के 76 फीसदी ने कहा कि हम एक दिन पहले ही तोहफा खरीदेंगे, जबकि अन्य देश वाले एक महीने पहले से खरीदारी शुरू कर देते हैं. सर्वे में पता चला कि वैलेंटाइन डे के सबसे पॉपुलर गिफ्ट चॉकलेट और फूल हैं.

Wednesday, February 4, 2009

फरवरी में गर्लफ्रेंड-ब्वॉय फ्रेंड

आज का युवा वर्ग हर दृष्टि से काफी स्पष्टवादी है। जीवन के महत्वपूर्ण पहलू विवाह के लिए भी वह स्वयं निर्णय लेना चाहता है। जब कोई उन्हें भा जाता है, उनके दिलोदिमाग पर छा जाता है तो वह उसे जीवनसाथी बनाने का मन बना लेते हैं। किसी अनजान अजनबी के साथ बंधने की बजाय वह उस शक्स के साथ बंधना चाहते हैं जिन्हें वे प्यार करते हैं, जानते समझते हैं। यदि प्रेम विवाह में धर्म प्रेम विवाह भी कई बार असफल हो जाते हैं। ऐसा तब होता है जब प्रेमी-प्रेमिका जज्बातों में बहकर जल्दबाजी में विवाह का फैसला ले लेते हैं। ऐसे में विवाह बाद बी वे जीवनसाथी से वैसी ही अपेक्षाएं करते हैं जैसी विवाह पूर्व करते थे। वे भूल जाते हैं कि विवाह पूर्व की परिस्थितियां भिन्न थीं तब कुछ समय के लिए प्रेमी-प्रेमिका मिलते थे। एक दूसरे के सम्मुख खूबसूरत दिखने के अलावा अच्छे से अच्छा व्यवहार करते थे। विवाह के बाद जब पति-पत्नी बनते हैं तब वे कल्पनालोक से उतर कर यथार्थ के धरातल पर आते हैं जो जाहिर है कल्पना के सुनहरी ख्वाबों से भिन्न होता है। यहां एक दूसरे को प्रसन्न करने के लिए छोटे-छोटे सुखद
आज के लड़के भले ही अपनी मोटरबाइक पर हर रोज नई लड़की को सैर कराते हों लेकिन जब शादी की बात आती है तो वे एकदम अनछुई, समझदार व सुंदर लड़की तलाशते हैं। यानी गर्लफ्रेंड कोई भी कैसी भी चलेगी लेकिन पत्नी का ग्राफ उनके मस्तिष्क में पहले से बना होता है। भावी पत्नी चुनने के लिए वे फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं। कुंवारी कन्या की तलाश में चले हैं, क्या कहा आप भी कुंवारे हैं, बगलें क्यों झांकने लगे आप ? आज के लड़के भले ही कितनी ही लड़कियों के साथ फ्लर्ट कर चुके हों लेकिन ब्वायफ्रेंड की शौकीन लड़की को कभी बी अपनी संगिनी नहीं बनाना चाहते। यहां तक कि कोई उनकी पत्नी से हंस-बोल कर खुलकर बातें करें, उनके लिए यह सहना भी मुश्किल होता है। आज के लड़के कामकाजी लड़कियों को ज्यादा पसंद करते हैं। आज जिसके पास पैसा है वहां सारी सुविधाएं हैं। एक से भले दो हों तो पैसा भी कमाएंगे खर्च भी खुले हाथ करेंगे। वे चाहते हैं उनकी मां की खूबियों के अलावा उनकी जीवनसंगिनी हर मोर्चे पर उनका हाथ बंटाने वाली हो, अर्थव्यवस्था का बोझ उठाने वाली हो। उनके ख्वाबों की हूर की परी ऐश्वर्या न सही उससे मिलती-जुलती जरूर रहती है। जो दिखने में सुंदर व देहयष्टि से स्लिम-ट्रिम हो। आज के युवा शर्मीली लड़की की बजाय फुर्तीली लड़की से शादी करना चाहते हैं जो शारीरिक रूप से स्वस्थ हो। चाहिए इंटेलीजेंसी भी छरहरी देहयष्टि की लड़की की चाहत तो हर किसी लड़के में रहती है साथ ही वे उसकी बुद्धिमता के भी कायल है।

Monday, February 2, 2009

बुद्धिजीवी वर्ग की कूपमंडूकता


बुद्धिजीवियों का भी एक बड़ा तबका ऐसा हो चुका है जिसके लिए मजदूरों की जिंदगी और उसके संघर्ष किसी दूसरी दुनिया की बात बन चुके हैं. आज चंद एक संगठनों और उँगलियों पर गिने जाने वाले बुद्धिजीवियों ने मजदूरों के पक्ष में एकता फोरम का गठन किया है. लेकिन एक समय ऐसा था जब दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता जैसे शहरों में ऐसी कोई घटना घटने पर सैंकडों बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार आदि न केवल ज्ञापन आदि और कानूनी सहायता प्रदान करने जैसे कामों में सक्रिय हो जाते थे बल्कि मजदूरों के पक्ष में कई बार सडकों पर भी उतरते थे. आज तो ज्यादातर प्रगतिशील बुद्धिजीवी भी चंद एक ईमेल भेजकर संतुष्ट हो जाते हैं. आज इतने विश्वविद्यालय और कॉलेज हैं, मीडिया का इतना विस्तार हुआ, मीडिया में काम करने वालों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है, फ़िर भी मजदूरों पर दमन की बड़ी से बड़ी घटनाएँ भी मुठ्ठीभर लोगों को उद्वेलित नहीं कर पाती. यह बात भी इस सच्चाई को ही साबित करती है की मजदूर वर्ग को अपनी मुक्ति की लडाई ख़ुद ही लड़नी होगी. अपने दमन-उत्पीडन के खिलाफ संगठित होकर संघर्ष करना होगा. जब वह संगठित हो जाएगा, तब उसके पक्ष में आवाज उठाने वाले भी चले आएँगे.




बाल मजदूरी का कारण गरीब माँ-बाप का लालच या बेबसी ?

विद्वान प्रोफेसर जुत्शी साहब से दो बातें

अभी पिछले दिनों एक एन.जी.ओ. ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ की ओर से दिल्ली में एक संवादाता सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें फुटबाल सिलने वाले बच्चों की दशा और दिशा पर चर्चा हुई. इस संवाददाता सम्मेलन में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक विद्वान प्रोफेसर बी. जुत्शी ने फ़रमाया कि बाल मजदूरी के लिए बच्चों के माता-पिता ही जिम्मेदार हैं जो अतिरिक्त आय के लिए अपने बच्चों को काम में लगा देते हैं.

विद्वान प्रोफेसर साहब के खयाल से गरीब माँ-बाप थोड़ा कम इन्सान होते हैं, जो अपने बच्चों को प्यार नहीं करते, पढा-लिखाकर उनका भविष्य नहीं संवारना चाहते और “अतिरिक्त आमदनी” के लिए उनका वर्तमान और भविष्य उजरती गुलामी के अंधेरे में झोंक देना चाहते हैं.

आदरणीय जुत्शी साहब, हम लोग बरसों से नोएडा, दिल्ली की असंगठित, गरीब मेहनतकश आबादी के बीच काम कर रहे हैं. पिछले दिनों गाजियाबाद. नोएडा और दिल्ली की मजदूर बस्तियों से गायब होने वाले बच्चों के बारे में जाँच-पड़ताल करने और रिपोर्ट तैयार करने के दौरान हमें मजदूर बस्तियों के बच्चों के जीवन के बारे में कुछ और अधिक गहराई से जानने का अवसर मिला. हम आपको यकीन दिलाना चाहते हैं कि गरीब मजदूर भी सामान्य इन्सान होते हैं और शायद समृद्धि की चकाचौंध भरे अतिरेक में जीने वालों से अधिक इन्सान होते हैं. चंद एक अपवादस्वरूप, विमानवीकृत (डीह्यूमनाईज़ड) शराबखोर चरित्रों को छोड़ दे, तो हर गरीब अपने बच्चे को किसी भी तरह से पढाना-लिखाना चाहता है. वह उसे उजरती गुलामी की रसातल से बाहर निकालना चाहता है, पर ठोस हकीकत की चट्टान से सर टकराकर समझ जाता है कि मजदूर का बच्चा भी ८५ फीसदी मामलों में मजदूरी करने की लिए ही पैदा होता है. जुत्शी साहब, इस सच्चाई को तो डेढ़ सौ साल पहले कार्ल मार्क्स ही नहीं, बहुतेरे बुर्जुआ यथार्थवादी साहित्यकार भी समझ चुके थे कि मजदूर अपनी श्रम शक्ति बेचकर उतना ही हासिल कर पाते हैं कि श्रम करने के लिए जिंदा रहें और मजदूरों की नई पीढी पैदा कर सकें. आप शायद मंगल ग्रह से आये हैं या ज़्यादा किताबें पढ़ लेने से जिंदगी की हकीकत आपकी नजरों से ओझल हो गयी है. नोएडा और दिल्ली में ४० रूपये से साठ रूपये की दिहाड़ी पर औरत-मर्द मजदूर आठ, दस या कहीं-कहीं बारह घंटे काम करते हैं. सिंगल रेट पर कभी-कभार ओवर-टाइम मिल जाता है तो महीने में कई दिन बेकारी के भी होते हैं. मालिक या ठेकेदार की ओर से शिक्षा, स्वास्थ्य या आवास की कोई सुविधा नहीं होती. इन हालात में पति-पत्नी दोनों लगातार काम करने के बाद मुश्किल से दो जून की रोटी, झुग्गी का किराया, कुछ कपड़े आदि की जरूरतें पूरी कर पाते हैं. क़र्ज़ लिए बिना दवा इलाज नहीं हो पता और फ़िर उस क़र्ज़ को चुकाने का सिलसिला चलता रहता है. इस हालत में मुश्किल से ही मजदूरों के बच्चे दो जून की रोटी खा पाते हैं. सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए भी पेट में रोटी तो होनी चाहिए ही. क्या आप इन आंकडों से परिचित नहीं हैं कि अस्सी फीसदी से भी अधिक मजदूरों के बच्चे कुपोषण के शिकार होते हैं. आपका जो नजरिया है, उसके हिसाब से तो शायद गरीब लोग पैसा बचाने के लिए अपने बच्चों को रोटी नहीं देते. नहीं, प्रोफेसर महोदय, ऐसा नहीं हैं. जब हड्डियाँ गलाकर भी मजदूर बच्चे को भरपेट भोजन, तन पर कपडा और बीमारी में दवा नहीं दे पाता तो कलेजे पर सिल रखकर यह तय करता है कि कप-प्लेट धोकर, सामान धोकर, गाडियां साफकर या फुटबाल सिलकर शायद बच्चा जिंदा रह सके और जिंदगी की कोई बेहतर राह निकाल सके. उसके सामने कई विकल्प नहीं, बल्कि एकमात्र विकल्प होता है और वह उसे चुनने के लिए विवश होता है.

दूसरी बात आपको और बताएं जुत्शी साहब! कुछ मजदूर यदि बच्चों को पढा पाने की स्थिति में अगर होते भी हैं तो वे यह भली-भांति जानते हैं कि उनके बच्चे आप जैसे बच्चों के समान डॉक्टर, इंजिनियर, प्रोफेसर, वकील, तो दूर म्युनिसिपैलिटी के क्लर्क भी शायद ही बन पायें ऐसी स्थिति में वे उन्हें जल्दी ही मजदूरी के काम में लगा देना चाहते हैं ताकि उसी में हुनरमंद होकर शायद वे थोड़ा बेहतर जीवन जी सकें.

जुत्शी साहब, जरा इतिहास का अध्ययन कीजिए. पूंजीवाद की बुनियाद ही स्त्रियों और बच्चों के सस्ते श्रम को निचोड़कर तैयार हुई थी. बीच में मजदूरों ने लड़कर कुछ हक हासिल किए थे. अब बीसवीं सदी की मजदूर क्रांतियों की हार और मजदूर आन्दोलन के गतिरोध के बाद, नवउदारवादी दौर में, पूँजी की डायन एक बार फ़िर सस्ती श्रम की तलाश में पूरी पृथ्वी पर भाग रही है और असंगठित, दिहाड़ी, ठेका मजदूरों- विशेषकर स्त्रियों और बच्चों की हड्डियाँ निचोड़ रही है. “कल्याणकारी राज्य” हवा हो गया है. श्रम कानूनों और जीने के अधिकार का कोई मतलब नहीं रह गया है. ऐसी सूरत में पूंजीवादी लूट का अँधा-अमानवीय तर्क उस सीमा तक आगे न बढ़ जाए कि लोग जीने के लिए विद्रोह पर अमादा हो जायें, इसके लिए विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी फंडिंग से एन.जी.ओ. नेटवर्क खडा किया गया है जो पूंजीवादी बर्बरता को सुधार के रेशमी लबादे से ढकने, पूंजीवादी जनवार की तार-तार हो रही चादर की पैबंदसाजी करने और भड़कते जनाक्रोश पर कुछ पानी के छींटे मारने का काम करता है. ये तमाम एन.जी.ओ. पूंजीवादी व्यवस्था की बजाय जनता को ही, उसकी बदहालियों के लिए दोषी ठहराते हैं और धर्म-प्रचारकों की तरह उसके उत्थान की बातें करते रहते हैं. ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ भी ऐसा ही एक एन.जी.ओ. है. कैलाश सत्यार्थी और ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ का एक और उद्देश्य होता है. पिछडे देशों के पूंजीपति अपने देशों के सस्ते श्रम के चलते उत्पादित माल को सस्ते में बेचकर साम्राज्यवादी देशों के पूंजीपतियों के सामने कुछ क्षेत्रों में प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति पैदा कर देते हैं, इसलिए धनी देशों के पूंजीपति एक ओर तो ख़ुद भी पिछडे देशों को अपना ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ बनाना चाहते हैं, दूसरी ओर वे अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों और वित्तपोषित एन.जी.ओ. द्वारा तीसरी दुनिया के देशों में बाल श्रम पर प्रतिबन्ध के लिए आवाज उठाकर इन देशों के पूंजीपतियों को प्रतिस्पर्द्धा से बाहर करने की कोशिश भी करते हैं. ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ को धनी देशों की फंडिंग एजेंसियों से पैसा किसलिए और क्यों मिलता है, इसे आप न जानते हों, इतने मासूम भी तो आप नहीं होंगे जुत्शी साहब!

अतरिक्त आय! क्या बात है! जुत्शी साहब, आपके लिए अतिरिक्त आय का मतलब है नये बंगले, कार, छुट्टियों में विदेश यात्रा या संम्पत्ति बढाने के लिए, या फ़िर शेयर में लगाकर पैसे से पैसा बनाने के लिए कुछ धन जुटा लेना. पर गरीब के लिए अतिरिक्त और कुछ नहीं होता. पर आप जैसे प्रोफेसर लोग जो हफ्ते में तीन-चार क्लास लेकर साल में छः मास पढाते हैं और महीने में ३०-३५ हजार रूपए उठाते हैं, वे इस बात को नहीं समझ सकते. समृद्धि की मीनार की किसी मंजिल पर रहते हुए उसके तलघर के अंधेरे को देख पाना सम्भव भी नहीं होता.

जुत्शी साहब, आप तो शायद यही सोचते होंगे कि गरीबों के बच्चे ही अपने घरों से भागकर महानगरों के अपराधियों के हत्थे चढ़ जाते हैं, चोर-मवाली-पौकेटमार -भिखमंगे और नशेड़ी बन जाते हैं, उन्हें बेच दिया जाता है, उनके अंगों की तस्करी की जाती हैं, इसमें दोष गरीबों का ही है. आप शायद सोच भी नहीं सकते की समृद्धि की चकाचौंध और अमीरों के बच्चों को मिले ऐशो-आराम को तिल-तिल करके आभाव में जीते गरीबों के बच्चे किस निगाह से देखते हैं और उनके दिलो-दिमाग पर क्या प्रभाव पड़ता है. आप शायद यह नहीं जान सकते की पूरी दुनिया के लिए जीने की बुनियादी चीजें उत्पादित करने वाले जिन लोगों को इन्सान की तरह जीने के लिए न्यूनतम चीजें भी मयस्सर नहीं होती, उनके घरेलू और सामाजिक परिवेश में किस कदर विमानवीकरण का घटाटोप होता है. इस आभाव और विमानवीकरण के परिवेश में घुटने वाले मासूम यदि घरों से भाग जाते हैं तो इसके लिए उनके बेबस माँ-बाप नहीं बल्कि यह सामाजिक ढांचा और राजनितिक व्यवस्था जिम्मेदार होती हैं.

पर ये बातें आपको बताने का फायदा ही क्या? आप इन्हें नहीं समझ सकते, क्योंकि सबकुछ समझकर न समझने वाले की समझ तो हकीम लुकमान भी नहीं बढा सकते!


पूंजीवादी व्यवस्था ने पैदा किया आतंकवाद का नासूर

यह अंधराष्ट्रवादी जूनून में बहने का नहीं,

संजीदगी से सोचने और फ़ैसला करने का वक्त है.

मुंबई में आतंकवादी हमले की घटना. है कोई भी विवेकवान और संवेदनशील व्यक्ति इस घटना और इससे पैदा हुई स्थिति पर औपचारिक या अखबारी ढंग से भावनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करेगा बल्कि पूरे राजनितिक-सामाजिक परिदृश्य पर अत्यन्त चिंता और सरोकार के साथ विचार करेगा.यह घटना है कि जब प्रगति की धारा पर गतिरोध की धारा हावी होती है तो किस तरह राजनीती के एजेंडा पर शासक वर्गों की राजनीती हावी हो जाती है और उनके तरह-तरह के टकराव विकृत रूपों में सामने आते हैं जिनकी कीमत जनता को चुकानी पड़ती है. देश के भीतर और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के स्तर पर शासक धड़ों के बीच के टकराव विभिन्न रूपों में समाज में कलह-विग्रह पैदा करते रहे हैं. इसके अलावा शासक जमात की नीतियों की बदौलत एक लम्बी प्रक्रिया में आतंकवाद पैदा हुआ और फैलता गया है. शासक वर्ग एक हद तक अपने-अपने हितों के लिए इसका इस्तेमाल भी करते रहे हैं लेकिन कभी-कभी यह उनके हाथ से बाहर निकल जाता रहा है. दोनों ही सूरतों में इसकी कीमत जनता ही चुकाती रही है. पूंजीवादी मीडिया ने इस घटना के समय से ही जैसा उन्मादभरा माहौल बना रखा है उसमें संजीदगी से सोचने की ज़रूरत और भी बढ़ गयी है. टीआरपी बढाने के लिए सनसनी के भूखे मीडिया को तो इस घटना ने मानो मुंहमांगी मुराद दे दी. घटना के ‘दिन’ से ही सारे टीवी चैनल एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में जुट गये थे. किसी का कैमरामैन कमांडो के पीछे-पीछे घुसा जा रहा था तो किसी का रिपोर्टर अपनी सारी अभिनय प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए रिपोर्टिंग को ज्यादा से ज्यादा नाटकीय बना रहा था. गोली चलने, बम फटने, आग लगने, या किसी के मरने के दृश्य को किसने सबसे पहले दिखाया इसे बताने की होड़ का बेशर्मीभरा प्रदर्शन लगातार तीन दिन तक चलता रहा. कुल मिलाकर, इस पूरी घटना को देशभक्ति के पुट वाली जासूसी या अपराध कथा जैसा बना दिया गया. अधिकांश चैनलों और अख़बारों की रिपोर्टिंग ने साम्प्रदायिकता का रंग चढी हुई देशभक्ति और अंधराष्ट्रवादी भावनाओं को उभाड़ने का ही काम किया. हालाँकि कुछ संजीदा पत्रकारों और बुद्धिजीविओं ने कहा कि किसी एक सम्प्रदाय विशेष को कठघरे में खडा करना या सीधे पाकिस्तान को निशाना बनाना ठीक नहीं है, लेकिन यह धारा कमज़ोर थी.

इस बात में ज़्यादा संदेह नहीं है कि इस हमले के पीछे जैश-ऐ-मोहम्मद या लश्करे-तैयबा और अल-कायदा जैसे संगठनों का हाथ हो सकता है और इसके लिए पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किया गया है. पाकिस्तान में आज कई वर्ग शक्तियों का टकराव बहुत तीखा हो चुका है और बहुत सी शक्तियाँ सत्ता के नियंत्रण से स्वतंत्र होकर काम कर रही हैं. आईएसआई और सेना के भीतर पुनरुत्थानवादी कट्टरपंथियों के मज़बूत धडे हैं और ये पूरी तरह सरकार के कहने से नहीं चलते हैं. साथ ही यह भी सच है कि जब-जब शासक वर्ग आर्थिक-राजनितिक संकट में फंसते हैं तब-तब अंधराष्ट्रवाद की लहर पैदा करने की कोशिक की जाती है. इससे दोनों हुक्मरानों के हित सधते हैं. अपने-अपने शासक वर्गों की जरूरतों के मुताबिक कभी ये युद्ध के लिए आमादा दिखाई पड़ते हैं तो कभी गले मिलते नजर आते हैं. जो मुशर्रफ कारगिल में युद्ध के लिए जिम्मेदार था, वही कुछ महीने बाद आगरा में शान्ति दूत बना नजर आता है.

पाकिस्तान में भी कुछ लोगों ने इस मौके पर संजीदगी से काम करने की बात कही लेकिन आसिफ अली जरदारी की कमजोर सत्ता ने इस तरह के बयान देकर फ़िर वही पुराना दांव खेलना शुरू कर दिया है कि हम हर तरह से तैयार हैं-दोस्ती चाहो तो दोस्ती, जंग चाहो तो जंग कर लो. यह अयूब खान और भुट्टो के जमाने से चला आ रहा आजमूदा दांव है. भूलना नही चाहिए कि पाकिस्तान की आर्थिक हालत इस समय इतनी खराब है कि अभी एक महिना पहले वह दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गया था. ऐसे में, इस घटनाक्रम से ज़रदारी की भी गोट लाल हो रही है और भारत-विरोधी अंधराष्ट्रवादी लहर पैदा कर उसका फायद उठाने की वे पूरी कोशिश कर रहे हैं.

भारतीय शासक वर्ग के विभिन्न धड़े भी अपने-अपने ढंग से इसका फायदा उठाने में लगे हैं. आर्थिक मंदी और कमरतोड़ महंगाई से निपट पाने में पूरी तरह नाकाम मनमोहन सिंह सरकार को मूल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने का मौका मिल गया है. चुनाव में अल्पसंख्यक वोटों के लिए पोटा हटाने का कांग्रेस ने वादा तो किया था लेकिन ऐसा कड़ा कानून आज भारतीय शासक वर्ग की ज़रूरत भी है और इस मुद्दे पर भाजपा के हमले से वह दबाब में भी है. इस घटना के बहाने उसे पोटा से भी सख्त कानून बनाने का मौका मिल गया है.

उधर भाजपा को ऐन विधानसभा चुनाव के पहले एक ऐसा मुद्दा मिल गया जिसे वह जमकर भुनाने की कोशिश कर रही है और जिसके शोर में मालेगंव तथा नांदेड़ आदि बम धमाकों में पकडे गया हिंदू आतंकवादियों का मामला फिलहाल पृष्ठभूमि में चला गया है. संघ गिरोह के संगठनों को हम तो पहले भी आतंकवादी मानते थे- गुजरात और उड़ीसा में जो कुछ इन्होने किया वह भी आतंकवाद ही था. योजनाबद्ध ढंग से बहशी भीड़ को लेकर गर्भवती औरतों के पेट चीरकर बच्चों को काट डालना, सामूहिक बलात्कार, लोगों को जिंदा जला देना- ये सब भी बर्बर, वहशी आतंकवाद ही है. लेकिन इनका दूसरा रूप भी जनता के सामने नंगा हो रहा था जिस पर अब पर्दा पड़ गया है. इसे भुनाने के लिए ये इतने उतावले थे कि मुठभेड़ अभी जारी ही थी कि नरेंद्र मोदी और आडवणी मुंबई पहुंचकर बयानबाजी करने लगे.

मीडिया में लगातार इस पर चर्चा जारी है कि यह घटना सुरक्षा इंतजामों और खुफिया तन्त्र की खामियों का नतीजा है. पर सच तो यह है कि महज़ इंतजामों को चाक-चौबंद करके ऐसे हमलों को नहीं रोका जा सकता. अगर भारत इजराइल से हथियारों का सौदा करेगा, अमेरिका के इशारे पर इरान विरोधी बयान देगा, अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीन के साथ दिखाई जाने वाली रस्मी एकता से भी पीछे हटेगा, अफगानिस्तान में हामिद करजई की अमेरिकी कठपुतली सरकार के साथ गलबहियां डालेगा और अमेरिका टट्टू जैसा आचरण करेगा तो ख़ुद अमेरिका के पैदा किए हुए तालिबान और अलकायदा जैसे भस्मासुरों का यहाँ-वहां निशाना बनने से भला कब तक बचेगा. भारतीय विदेशनीति के चलते इसकी छवि दिन-ब-दिन अमेंरिका-परस्त और पश्चिम परस्त बनती जा रही है. बेशक, आतंकवाद द्वारा साम्राज्यवाद का कोई विरोध नहीं किया जा सकता और अंततः यह साम्राज्यवाद को फायदा ही पहुंचता है लेकिन जो आतंकवादी संगठन सोचते हैं कि अपने ढंग से साम्राज्यवाद पर चोट कर रहे हैं उन्होंने भारत को भी निशाने पर ले लिया है.

इसके साथ ही, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आडवणी की रथयात्रा और बाबरी मस्जिद गिराए जाने के समय से हो रही घटनाएँ देश के अल्पसंख्यक समुदाय के अलगाव और अपमान को लगातार बढाती रही हैं. किसी क्रान्तिकारी विकल्प की गैर-मौजूदगी में उनकी गहन निराशा और घुटन बढ़ती जा रही है. जब गुजरात जैसे नरसंहार और टीवी पर बाबू बजरंगी जैसे लोगों को सरेआम अपनी बर्बर हरकतों का बयान करते दिखाने के बाद भी किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती और दूसरी तरफ महज़ अल्पसंख्यक होने के कारण हजारों नौजवानों को गिरफ्तार और टॉर्चर किया जाता है, फर्जी मुठभेडों में मार दिया जाता है तो इस देश में इन्साफ मिलने की उनकी उम्मीद दिन-ब-दिन ख़त्म होती जाती है. ऐसे में गहरी निराशा और बेबसी की हालत में, कोई उपाय न देखकर प्रतिक्रियास्वरूप कुछ युवा आतंकवाद की तरफ मुड़ सकते है. मुंबई जैसी घटनाओं के बाद बना माहौल, जिसमे मीडिया की मुख्य भूमिका है, अल्पसंख्यकों के अलगाव को और बढा ही रहा है. अख़बारों में भी ऐसी अनेक घटनाओं की खबर आई है कि २६ नवंबर के बाद स्कूल से लेकर कार्यालय और रेल-बस तक में लोगों को उनके मजहब के कारण अपमानित किया गया है. बुर्जुआ राज्य के हित में दूर तक सोचने वाले कुछ संजीदा बुद्धिजीवी संयम से काम लेने की सलाह दे रहे हैं और ऐसी बाते कर रहे हैं कि संकट की इस घडी में हम सबको एक रहना चाहिए, आदि-आदि. लेकिन प्रकारान्तर से ये भी उस समुदाय के अलगाव को बढाने का ही काम कर रहे हैं जिसकी वफादारी को हिंदू कट्टरपंथी पाकिस्तान से जोड़कर उसे गैर-देशभक्त साबित करने पर तुले रहते हैं.

इस वक्त देश की एकता की काफी बातें की जा रही हैं मानों टाटा-बिड़ला-अम्बानी से लेकर २० रूपये रोज़ पर जीने वाले ८४ करोड़ गरीब लोगों तक सबके हित एक ही हैं. आज तक देशभर में होने वाले बम-विस्फोटों, दंगे-फसाद में हजारों आम लोग मरते रहे, उनके घर जलते रहे पर इतना बडा मुद्दा कभी नहीं बना. इस बार सबसे अधिक बवंडर इसलिए भी मचा है क्योंकि आतंकवादियों ने ताज होटल जैसे भारत के “आर्थिक प्रतीकचिह्नों” पर हमला किया है. उस ताज होटल पर जिसके बारे में एक अख़बार ने लिखा कि ताज में घुसने पर पता चलता है कि विलासिता और शानो-शौकत क्या होती है ! जिसके एक सुइट का एक दिन का किराया एक मजदूर की साल भर की कमाई से ज़्यादा होता है ! छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर सबसे बड़ी संख्या में मारे गये आम लोगों के लिए इतनी चिंता और दुःख नहीं जताया जा रहा जितना की ताज और ओबरॉय होटलों में मरने वाले लोगों के लिए. सीएसटी स्टेशन पर मरने वाले सारे लोग आम लोग थे- कोई दिनभर की मेहनत के बाद घर लौट रहा था, कोई परिवार सहित अपने गाँव जा रहा था, कोई नौकरी के इंटरव्यू के लिए ट्रेन पकड़ने आया था. लेकिन इस समाज में आम आदमी की जिंदगी भी सस्ती होती है और उसकी मौत भी.

मुंबई की घटना के बाद उद्योगपतियों से लेकर फ़िल्म-स्टारों तक उपरी तबके के तमाम लोग अचानक आतंकवाद के खिलाफ सड़क पर उतर आये क्योंकि इस हमले ने पहली बार उनके भीतर अपनी जान का भय पैदा कर दिया. अब तक आतंकवादी हमलों में अक्सर आम लोग ही मरते थे और वे सोचते थे बंदूकधारी सिक्यूरिटी गार्डों और ऊँची दीवारों से घिरे अपने बंगलों में वे सुरक्षित हैं, लेकिन इस बार उन्हें लगने लगा कि अब तो हद ही हो गयी ! अब तो हम भी महफूज नहीं!

लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है. यह घटना देश की चोर, भ्रष्ट, विलासी और आपराधिक नेताशाही के खिलाफ़ आम जनता को स्वर देने का भी जरिया बन गयी. नेताओं की लूट-खसोट, निकम्मेपन और ख़ुद भयंकर खर्चीले सुरक्षा तन्त्र में रहते हुए जनता की सुरक्षा पर ध्यान न देने वाले नेताओं पर लोगों का गुस्सा फूट पडा. इस घटना पर लोगों की प्रतिक्रियाओं के कई पहलू थे लेकिन सबसे अधिक नफ़रत और गुस्सा हर पार्टी की नेताशाही के खिलाफ़ था. किसी ने कहा कि नेता बार-बार कहते हैं कि वे जनता के लिए प्राण न्यौछावर कर देंगे तो क्यों नहीं वे अपनी सुरक्षा छोड़कर लोगों के बीच चले आते. एक महिला ने कहा कि जितनी सुरक्षा एक-एक नेता को दी जाती है उतने में बच्चों के एक-एक स्कूल की सुरक्षा का इंतजाम किया जा सकता है- क्या सैंकडों बच्चों की जान एक नेता से भी कम कीमती है? बेशक, लोगों के गुस्से का यह उभार तात्कालिक है और किसी संगठित आन्दोलन के आभाव में जल्दी ही यह शांत हो जाएगा, लेकिन इसने सत्ताधारियों की पूरी जमात को इस बात का अहसास जरूर करा दिया होगा कि जनता के मन में नेताओं के खिलाफ़ किस क़दर नफ़रत भरी हुई है.

मुंबई की घटना कोई अलग-थलग घटना नहीं है और न ही सुरक्षा के सरकारी उपायों को चुस्त-दुरस्त करने से ऐसी घटनाओं की पुनरावृति को रोका जा सकता है. प्रश्न को व्यापक सन्दर्भों में देखना होगा. आतंकवाद एक वैश्विक परिघटना भी है जिसकी जड़ें साम्राज्यवादी देशों की नीतियों में हैं. भारतीय समाज का भी यह एक असाध्य रोग बन चुका है जिसे यहाँ की आर्थिक-राजनितिक स्थितियों ने पैदा किया है और खाद-पानी दिया है. यह पूंजीवादी व्यवस्था के चौतरफा संकट की ही एक अभिव्यक्ति है. विभिन्न रूपों में आतंकवादी घटनाएँ पूरे देश में हो रही हैं. इस व्यवस्था के पास इसका कोई समाधान नहीं है, बल्कि व्यवस्था का आर्थिक संकट इसके लिए और जमीन तैयार कर रहा है. आतंकवाद इस व्यवस्था का एक ऐसा नासूर है जो रिसता रहेगा और समाज में कलह और तकलीफ पैदा करता रहेगा. लोगों को आपस में लडाने वाली इस लुटेरी और अत्याचारी व्यवस्था के नाश के साथ ही इस नासूर का भी अंत होगा.

जनता का एक हिस्सा इन बातों को समझता भी है लेकिन जनता का बड़ा हिस्सा अंधराष्ट्रवादी जूनून में भी बहने लगता है. शासक वर्ग के हित भी इससे पूरे होते हैं. आतंकवाद रोकने के नाम पर संघीय जाँच एजेंसी गठित करने और पोटा से भी कड़ा कानून बनाने की जो कवायदें की जा रही हैं उनसे आतंकवाद को तो रोका नहीं जा सकेगा मगर इनका असली इस्तेमाल होगा मेहनतकशों के आंदोलनों को कुचलने के लिए. रासुका और टाडा से लेकर पोटा तक इसके उदाहरण हैं.

हर तरह का आतंकवाद जनता की वास्तविक मुक्ति के आन्दोलन को नुकसान पहुंचाता है. आतंकवाद के रास्ते से जनता कुछ हासिल नहीं कर सकती. असली सवाल एक क्रान्तिकारी विकल्प खडा करने का है. मेहनतकश वर्ग के उन्नत, वर्ग सचेत तत्वों को इस बात को समझना होगा और व्यापक मेहनतकश अवाम को इसके लिए संगठित करने की तैयारी करनी होगी.